दशक पूर्व पीटीवी का एक सीरियल दोनों देशों में खूब सराहा गया था। ‘रात, रेल और खत’ नामक इस सीरियल में एक दुर्घटनाग्रस्त रेल की गाथा थी। रेल लगभग आधी सदी पहले एक नदी में गिरी थी। आधी सदी की अवधि में नदी ने अपनी दिशा बदल ली। गहरे पानी की जगह रेत के टीले उग आए।
दुर्घटनाग्रस्त रेल के क्षत-विक्षत डिब्बे भी दिखाई दिए। लाशों की जगह कुछ अस्थि-पिंजर मिले और कुछ गले-सड़े अवशेष। उसी रेल के एक डिब्बे में डाक के कुछ थैले मिले। रेल-प्रशासन ने मानवीय संवेदनाओं के नाम पर उन खतों को उनके पतों पर पहुंचाने की कोशिश की, तो अनेक दुखद अध्याय खुले।
कमोबेश ऐसी ही कहानियां इस बार पाकिस्तान के पूर्व मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी को भारत व पाकिस्तान के कैदियों की दास्तानों में मिलीं। कई कश्मीर सिंह, सरबजीत सिंह, स्वर्ण लाल, मोहन लाल भास्कर, कश्मीरा सिंह (फिरोजपुर), गोपाल दास अभी भी अपनी दर्द भरी दास्तानों के साथ सीमा के दोनों तरफ कैद हैं। सीमा पर स्थित एक पंजाबी गांव का बाशिंदा गोपालदास जुलाई 1984 में भटककर पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश कर गया था। उसे तभी धर दबोचा गया और जून 1986 में जासूसी आदि के आरोपों में उम्रकैद की सजा मिली।
गत माह गोपालदास के भाई आनंदवीर ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आरवी रवीन्द्रन के समक्ष दायर याचिका में बताया गया कि गोपालदास की सजा की अवधि 2005 में पूरी हो चुकी थी, मगर अभी भी उसे मियांवाली जेल में बंद रखा गया है। गोपालदास की आज भी वही स्थिति है।
सुप्रीम कोर्ट हाल ही में कुछ अन्य याचिकाओं के माध्यम से सरकार को निर्देश जारी कर चुका है कि ऐसे सभी मामलों में सरकार तत्काल कार्यवाही करे। दिक्कत यह भी है कि ऐसे अमानुषिक मामलों की सही संख्या अभी तक सामने नहीं आ पा रही। पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मुहम्मद सादिक के अनुसार 133 पाक नागरिक और 14 पाक मछुआरे भारतीय जेलों में कैद हैं, जबकि 53 भारतीय नागरिक और 436 भारतीय मछुआरे पाकिस्तानी जेलों में हैं।
मगर उधर से रिहा होकर लौटे लोग बताते हैं कि अकेली कोट लखपत जेल व मियांवाली जेल में ही सड़ रहे भारतीयों की संख्या दो सौ से ज्यादा है। सरहदों की यह सियासत एक घिनौने दौर से गुजर रही है। पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आरएस मोंगिया के अनुसार आयोग की सिफारिश पर पंजाब सरकार ने पाकिस्तान के 46 कैदियों की रिहाई का प्रस्ताव भारत सरकार के समक्ष भेजने का निर्णय लिया है।
पंजाब में यह स्थिति ज्यादा विकट इसलिए भी है क्योंकि यहां सीमावर्ती कुछ गांव ऐसे हैं जहां से सीमा पार जाने वालों की संख्या काफी ज्यादा है। इसी संदर्भ में भारत और पाकिस्तान की संयुक्त न्यायिक समिति ने दिल्ली में हुई अपनी पहली बैठक में निर्णय किया था कि दोनों देश 31 मार्च तक अपनी-अपनी जेलों में बंद कैदियों की सूची देंगे, लेकिन यह आदान-प्रदान अधूरा रहा। अब यही न्यायिक समिति अप्रैल में पाकिस्तान की जेलों का दौरा करेगी और उसके बाद भारतीय जेलों का भी निरीक्षण होगा।
यह पहलकदमियां सार्थक तो हैं लेकिन कितनी ईमानदाराना हैं, यह तय नहीं है। जहां तक मछुआरों का सवाल है, इस संबंध में दोनों देश एक स्थायी नीति तो तय कर ही सकते हैं। यह मानकर चलना चाहिए कि यदि भारतीय पंजाब की जेलों में कैद 46 पाक कैदी इसी महीने लौटा दिए जाते हैं, तो पाकिस्तान की नई सरकार को सरबजीत सिंह जैसे मामलों में उदारता व सौहार्द दिखाने की एक ठोस दलील मिल जाएगी।
अंसार बर्नी को उनकी भारत यात्रा के दौरान एक मसीहा मान लिया गया। वस्तुत: यह प्रक्रिया पिछले छह दशकों से एक गंभीर पुनर्विचार की मोहताज है। भारतीय व पाक एजेंसियां एक-दूसरे के क्षेत्र में ‘सोर्स’ का अघोषित ठप्पा लगाकर एजेंट भेजती हैं। इन ‘एजेंटों’ को प्राय: अधिकृत रिकार्ड में दर्ज नहीं किया जाता। इनके कार्यकाल में इनके परिवारों की देखभाल भी नहीं होती और बाद में भी रिहाई या मौत की स्थिति में भी कोई मदद नहीं दी जाती।
वैसे तो रिश्तों की बेहतरी व बदलते हुए हालात एवं सूचना प्रौद्योगिकी की नई तकनीक का तकाजा है कि यह अदना जासूसी जाल दोनों ही देश समाप्त करें। अब तक की समस्या का समाधान ईमानदाराना पहलकदमी से ही मुमकिन है। यह पहलकदमी दोनों देशों की जागरूक व संवेदनशील न्यायपालिका भी कर सकती है और व्यावहारिक राजनीतिक नेतृत्व भी। एक ही बार में अदला-बदली भी मुमकिन है बशर्ते कि भविष्य के लिए कोई नीति बन जाए। कभी सीमा पर कंदीलें या मोमबत्तियां जलाकर व कभी अजोका थियेटर या ताज व लता मंगेशकर के नाम पर साझेदारी की बयानबाजियों से हम बेहतर रिश्तों की बातें कर रहे हैं, मगर अभी तक ‘हमसाए-मां जाये’ की देहाती कहावत का मर्म भी महसूस नहीं कर पाए।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।