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दस्तक दे रहा है नेपाल

एक नेपाल है हमारे मानचित्र पर। भारत से सटा, चीन से लगा। नक्शे की लकीर व्यवहार में चाहे दो ईंट की कच्ची भीत भी न हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सीमा तो है ना। चाहे आने-जाने में वीजा की बंदिश न हो, लेकिन झंडा और संविधान तो अलग है न। मानचित्र का यह नेपाल हमारा पड़ोसी देश कहलाएगा। एक नेपाल है हमारे मानसपटल पर। यह नेपाल न तो ‘हमारा’ है, न ही ‘पड़ोसी’। अगर अखबारी पन्नों को मानसपटल का एक दर्पण मानें, तो यह नेपाल किसी सुदूर महाद्वीप में स्थित है। इस मानसपटल पर हम अमेरिका के पड़ोसी हैं।

अमेरिकी चुनाव अभी सात महीने दूर हैं, पर वहां गिरने वाले हर पत्ते की गूंज हम सुन सकते हैं। लेकिन नेपाल में जो इतिहास रचा जा रहा है उससे हम प्राय: बेखबर हैं। कोई ऐसा-वैसा चुनाव नहीं है वहां, संविधान सभा का चुनाव होना है। पूरे नेपाल में अस्तित्व और अस्मिता की लड़ाई चल रही है, आकांक्षाओं का सैलाब है, आशंकाओं का ज्वार है। लेकिन यह राजनीतिक भूकंप हमारे मानसपटल की रडार पर दर्ज नहीं हो पाता। शायद चुनाव के दिन और दो-चार दिन आगे-पीछे कुछ खबरें छप जाएंगी। अगर हिंसा हो गई, तो खबर बड़ी भी बन सकती है।

नेपाल हमसे हमेशा इतनी दूर न था। एक पीढ़ी पहले तक नेपाल की हर उथल-पुथल हमारे मानसपटल पर दर्ज होती थी, भारत के समाजवादियों के नेपाली कांग्रेस के कार्यकलापों में आत्मीय संबंध होते थे। राणाशाही के खिलाफ नेपाली संघर्ष की दास्तान फणीश्वरनाथ रेणु लिखा करते थे।

सूचना क्रांति नहीं हुई थी, लेकिन नेपाली क्रांति की सूचना हमें मिल जाती थी। पूरी दुनिया अभी एक गांव नहीं बनी थी, लेकिन नेपाल, बर्मा और बांग्लादेश हमारे अपने ही गांव में माने जाते थे। इस आत्मीयता में कहीं कुछ बड़प्पन का अहसास होता होगा, लेकिन यह रिश्ता दादागीरी या धौंसपट्टी से परे था।

एक नेपाल है हमारे देश में, हमारे मन में। अलग-अलग रूप धारण करता है हमारे भीतर का यह नेपाल। उत्तर बंगाल में दार्जिलिंग की पहाड़ियों और सिक्किम में बहुसंख्यक नेपाली भाषा-भाषी समुदाय बार-बार हमें अपने भीतर के नेपाल की याद दिलाते हैं। कभी गोरखालैंड आंदोलन के बहाने, तो कभी इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के बहाने। हमारे भीतर के नेपाल का एक दूसरा चेहरा इन लाखों नेपाली मजदूरों का है, जो देश के कोने-कोने में आजीविका कमाने आते हैं। काम तरह-तरह के करते हैं, लेकिन छवि बनती है ‘कांचा’ की।

गोरखा रेजीमेंट के ‘बहादुर’ का मतलब बन जाता है चौकीदार। जाहिर है अपनी पहचान के बारे में सजग नई पीढ़ी को यह छवि नागवार गुजरती है। दिल्ली के एफएम रेडियो की एक टिप्पणी से हमारे भीतर का नेपाल आंदोलित हो उठता है। ऋतिक रोशन की एक बात से काठमांडू में दंगे की नौबत आ जाती है। हमारे भीतर का नेपाल जाग रहा है, लेकिन हम खुद अपने इस अंश से बेखबर हैं।

नेपाल के लिए अपने भीतर के भारत को नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं है। भारतीय मीडिया की छवियां नेपाल के हर गली-मुहल्ले पर छाई हुई है। भारतीय व्यापारी या ‘मारवाड़ी’ छोटे-बड़े हर धंधे में मौजूद हैं। भारत के पूर्वोत्तर की तरह यहां भी स्थानीय निवासियों में इन व्यापारियों के प्रति ईष्र्या है, शिकायत है, गुस्सा भी है। इन सबके चलते ‘भारतीय साम्राज्यवाद’ की छवि बनती है और नेपाली राजनीति में खूब चलती है।

इस छवि को संतुलित करता है नेपाल के भीतर भारत का एक दूसरा चेहरा। यह चेहरा है नेपाल के ‘मधेशी’ का। उत्तरप्रदेश और बिहार से सटे नेपाल के तराई इलाके, पहाड़ और मैदान के बीच के मध्यदेश में आज नेपाल की आधी आबादी निवास करती है। इस इलाके की अधिकांश आबादी उन्हीं जाति समुदायों से है, जो सीमा के उस पार भारत में निवास करते हैं। नागरिकता है नेपाली। भाषा मैथिली, भोजपुरी, अवधी या आपसी बातचीत के लिए हिंदी। रिश्तेदारी जितनी नेपाल में उतनी ही भारत में। मधेशी खुद को दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस करता है।

नया संविधान बनने की पूर्वसंध्या पर अचानक यह मधेशी समाज आज जाग गया है। एक नहीं, अनेक मधेशी पार्टियां चुनावी मैदान में कूद पड़ी हैं और उनका गुस्सा सड़कों पर उतर आया है। मधेशी पार्टियों के मोर्चे ने काठमांडू को मजबूर कर दिया है कि तराई क्षेत्र को संविधान सभा में यथोचित स्थान मिले। अगर भारत के भीतर नेपाल आंदोलित होना शुरू हुआ है, तो नेपाल के भीतर भारत का आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सुनते हैं कि मधेशी आंदोलन को राजशाही की शह है। बेवजह दखलंदाजी करने वालों में भारत सरकार और उसके कारिंदे भी हैं। नेपाल का शासक अपने भीतर के भारत को विदेशी की तरह देख रहा है।

इससे जुड़ा एक और नेपाल है, जो हमारे देश और मन दोनों से बाहर है। यह नेपाल सिर्फ और कोरा ‘विदेश’ है, विदेश मंत्रालय की बिसात का एक मोहरा है। इस नेपाल में हम दूतावास बनाते हैं जहां जाकर हमारे अफसर धौंस जमाते हैं। कुछ वैसे ही जैसे अमेरिकी दूतावास भारत में धौंस जमाता है। नेपाल के शासक और अफसर भी भारत सरकार से लुका-छिपी का खेल खेलते हैं, बीच-बीच में चीन से आंख लड़ाते हैं।

यही वह नेपाल है जिसे औकात बताने के लिए राजीव गांधी सरकार ने कुछ दिन के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा बंदकर उसका दम घोंट दिया था। पिछले साल राजशाही के खिलाफ नेपाल का जनांदोलन जब निर्णायक दौर में पहुंचा, तब ‘महाराजा’ कर्ण सिंह को दूत के रूप में भेजकर भारत सरकार ने जो फजीहत कराई, वो इसी नेपाल तक सीमित रहने का नतीजा था। धीरे-धीरे हमारे भीतर का नेपाल ओझल होता जा रहा है, पर राष्ट्र संबंध का गणित हावी होने लगा है।

एक दूसरे में गुंथे, एक साथ ही अंदर और बाहर के इस रिश्ते का उलझाव इस वैश्वीकृत दुनिया को मंजूर नहीं है। आधुनिक राष्ट्र-राज्य को चाहिए एक सीधी-साफ सरहद चाहे उसकी जो भी कीमत हो। उसे चाहिए पासपोर्ट से बंधी निष्ठा, जो स्मृति और भावनाओं में इधर-उधर न भटके। आधुनिक दुनिया के नए निजाम के खिलाफ खड़ा भीतर का नेपाल हमारे मानसपटल पर दस्तक दे रहा है, दुनिया के हर देश की स्मृति में अटके किसी नेपाल की याद दिलाता है और पूछता है कि क्या ऐसी दुनिया संभव है जिसमें हम सबको अपने मन से अपने-अपने नेपाल को खदेड़ना न पड़े? -लेखक ‘सामयिक वार्ता’ के संपादक हैं।





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