bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

कहां ले जाएगा यह क्षेत्रवाद!

आज हम साझा सरकार, साझे व्यापार और साझी संस्कृति के दौर में हैं और यह दौर अभी चलेगा, क्योंकि जैसे-जैसे पूरी दुनिया एक वैश्विक गांव में बदलती जा रही है, वैसे-वैसे सीमाओं और सरहदों के पार के सरोकार हमारे अपने होते जा रहे हैं या हमारे जीवन पर ज्यादा असर डालते जा रहे हैं। पिछले दिनों शेयर बाजार की गिरावट का कारण यदि विदेशी, खासतौर पर अमेरिकी बाजार की मंदी थी, तो आज की महंगाई के कारण भी काफी हद तक हमारी सीमाओं के बाहर पाए जा सकते हैं।

एक तरफ तो भारतीय प्रोफेशनल्स और प्रशिक्षित लोगों की मांग पूरी दुनिया में बढ़ती जा रही है, तो दूसरी ओर हमारे अपने देश में कुछ राज्यों में क्षेत्रवाद की मांग जोर पकड़ती जा रही है। पहले यह मांग उठाते समय राजनीतिक दल सोचते थे कि इनसे उनके राज्य या फिर राज्य के लोगों या फिर उनकी अपनी राजनीति पर कोई उलटा असर तो नहीं पड़ेगा और इसीलिए ऐसी मांग ज्यादा देर तक और दूर तक नहीं ले जाई जाती थी। जरा सोचिए कि यदि बेंगलूर, गुड़गांव और नोएडा में ऐसी मांग उठाई गई होती, तो वहां की व्यापार और सेवा क्षेत्र की कंपनियां कहां तक तरक्की कर पाती।

तो आज यदि महाराष्ट्र में वहां की निजी कंपनियों में मराठियों के लिए नौकरी में आरक्षण की मांग उठ रही है तो इसका असर मुंबई और पुणो में स्थापित निजी कंपनियों पर कैसा होगा? क्या कोई भी प्रदेश और वहां की इंडस्ट्री इसलिए ज्यादा तरक्की कर सकती हैं कि उनमें ज्यादातर वहीं के लोग काम करें? क्या बाहर के लोगों के लिए नौकरी के अवसर कम करके किसी क्षेत्र विशेष की कंपनियों को बढ़ावा मिलता है? और इससे भी आगे है यह सवाल कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत से बाहर काम कर रहे भारतीयों की पहचान का क्या होगा?

महाराष्ट्र में काम कर रहा मराठी व्यक्ति भारत की सरहद से बाहर जाते ही केवल भारतीय हो जाता है, पर कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा उठाई जा रही मांगों के चलते ऐसा न हो कि क्षेत्रवादी पहचान को भारत के बाहर भी ले जाने की तैयारी हो। फिर क्या वह दिन दूर नहीं जब विदेशों में काम कर रहे भारतीयों की पहचान और समस्याओं को भी उनके क्षेत्र या राज्य के लिए छोड़ दिया जाएगा? तब क्या होगा ‘भारतीय’ पहचान का? समय रहते इस तरह की क्षेत्रवादी मांगों को समझदारी से निपटाने की जरूरत है।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: