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अफसर से शुरू, तबादले पर खत्म

इंदौर. अपराधों की भट्टी में जल रहे शहर को बचाने के लिए न भारी पुलिस बल की जरूरत है, न किसी नए प्रयोग की। मौजूदा पुलिस अधिकारी ही जनता को विश्वास में लेकर भिड़ जाएं तो क्या नहीं हो सकता? पहले भी ऐसा होता रहा है।

90 के दशक में भी इंदौर में अपराध एकदम बढ़ने लगे थे तब पुलिस के पास न आज की तरह हाईटेक संसाधन थे, न पर्याप्त बल। फिर भी तब के पुलिस अधिकारियों ने अपराध की जड़ पर वार कर आम लोगों की ताकत से ही कानून का लोहा मनवाया।

1995-1996 में कम्युनिटी पुलिसिंग से जुड़ी सात योजनाएं सेव ए लाइफ लाइन, नशामुक्ति अभियान, परिवार परामर्श केंद्र, नगर सुरक्षा समिति, बाल मित्र केंद्र और चलित थाना शुरू की गईं। 1999 और 2001 में वी केयर फॉर यू तथा नेबरहुड स्कीम शुरू हुईं। इनसे हालत बदले और अपराधों पर अंकुश लगा लेकिन योजना शुरू करने वाले अधिकारियों के तबादलों के बाद उन पर भी ग्रहण लग गया। हालांकि चार योजनाएं चल रही हैं लेकिन उपेक्षा की शिकार होकर। उदाहरण बतौर नगर सुरक्षा समिति में 5000 सदस्य हैं जबकि पुलिस बल 3300 के करीब, फिर भी अपराध बढ़ रहे हैं।

अपराध रोकने का मनोवैज्ञानिक फंडा
कम्युनिटी पुलिसिंग समाज और पुलिस के सामंजस्य से अपराध रोकने का मनोवैज्ञानिक फंडा है। इसमें समाज की मदद से पुलिस अपराधियों को ऐसा माहौल देती है कि वे अपराध से तौबा कर लें। फिर उन्हें समाज में सम्मान के साथ स्थापित करने के प्रयास भी किए जाते हैं।

कब-कौन सी योजना शुरू हुई और क्या हश्र हुआ?

>> परिवार परामर्श केंद्र : 10 अक्टूबर 1995 को डीआईजी एनके त्रिपाठी ने महिला उत्पीड़न का मनोवैज्ञानिक हल निकालने के लिए प्रदेश के पहला परिवार परामर्श केंद्र शुरू किया।
अब : इंदौर जिले में 12 केंद्र लेकिन काम प्रभावी नहीं।
>> बाल मित्र थाना : 1995 में श्री त्रिपाठी ने ही स्कूली बच्चों के मन से पुलिस का भय निकालने के लिए थाने लाकर कार्यप्रणाली दिखाने-समझाने की पहल की।

अब : पूरी तरह ठप।

>> नगर सुरक्षा समिति : 26 जनवरी 1996 को श्री त्रिपाठी ने समाज की मदद से पुलिस का सूचना तंत्र मजबूत करने के लिए यह योजना शुरू की।
अब : 5000 सदस्य लेकिन सूचना तंत्र कमजोर। कुछ सदस्य ही सक्रिय, राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते कुछ थानों की समिति निष्क्रिय।
>> चलित थाना : 1996 में एसपी डीएस सेंगर ने दूरस्थ ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए एसडीएम, तहसीलदार तथा एसडीओपी की मौजूदगी में थाने की कार्रवाई उनके गांव जाकर शुरू की।
अब : श्री सेंगर 2000 तक इंदौर में रहे, तब तक हर थाने में चली। फिर बंद।
>> सेव-ए-लाइफ लाइन : 1996, एडीशनल एसपी वरुण कपूर, लोगों को आत्महत्या से रोकने के लिए दो मनोवैज्ञानिक डॉक्टर, पुलिस अधिकारी तथा समाज की मदद से 24 घंटे की हेल्प (फोन) लाइन शुरू की।

अब : उनके तबादले के बाद से ही बंद।

>> नशामुक्ति अभियान : 1996 में सीएसपी कोतवाली डॉ. रमणसिंह सिकरवार ने नशे के आदी लोगों को नशामुक्त कर अपराधी बनने से रोकने और फिर समाज से जोड़ने के लिए शुरू किया।
अब : उनके जाने के बाद बंद। 2002 में वे एडीशनल एसपी क्राइम बनकर आए तब फिर शुरू हुई और उनके जाते ही बंद हो गई।
>> बाल मित्र केंद्र : 1996 में डीआईजी त्रिपाठी ने तंग बस्ती के बच्चों को साक्षर बनाकर अपराध की दुनिया में जाने से रोकने की पहल की।
अब : संयोगितागंज, छत्रीपुरा थाना तथा एपीटीसी में ही चल रही है। इसके पीछे एसपी अंशुमान यादव की रुचि भी बड़ा कारण।
>> वी केयर फॉर यू : 1999 में एसपी सेंगर ने फोन पर महिलाओं को सताने वालों पर कड़ी कार्रवाई के लिए शुरू किया। इसका प्रभार भी महिला अधिकारी को सौंपा।

अब : महिलाओं के साथ पुरुषों को भी फायदा। अन्य योजनाओं से बेहतर स्थिति।

>> नेबरहुड स्कीम : 8 जुलाई 2001 को आईजी वीएम कंवर ने घर में अकेली महिलाओं तथा वृद्धों की सुरक्षा के लिए विपत्ति आने पर अलार्म के जरिए पड़ोसियों को सूचित करने की योजना लागू की।
ताजा स्थिति : भगवानदीननगर के संगीता अपार्टमेंट में शुरू हुई और वहीं सिमटकर रह गई।





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