जयपुर. सुप्रीम कोर्ट के उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण से क्रीमी लेयर को बाहर रखने के निर्णय का ओबीसी वर्ग के लोगों ने विरोध जताया है। उनका कहना है कि क्रीमी लेयर की सीमा बढ़ाई जाए या उसे पूरी तरह से खत्म किया जाए।
ओबीसी कमीशन के पूर्व सदस्य सचिव एस. एन. सिंह ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 15-16 में क्रीमी लेयर का प्रावधान नहीं है। वर्ष 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के फैसले में क्रीमी लेयर की बात कही गई थी। इसके बाद नौकरियों में क्रीमी लेयर को लागू कर दिया गया, लेकिन शिक्षण संस्थाओं में इसको लेकर कुछ भी नहीं हुआ। क्रीमी लेयर के निर्णय की समीक्षा होना चाहिए। पहले इसमें दो से ढाई लाख वार्षिक आय की सीमा तय है।
इसको क्रीमी लेयर मानी जाए तो ओबीसी वर्ग के लोगों को उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। आईआईटी, आईआईएम या एम्स जैसे संस्थाओं तक उन्हीं परिवारों के बच्चे पहुंच सकेंगे जो कुछ संपन्न हैं। बीपीएल या इसके आसपास के परिवारों की इन तक पहुंच नहीं है।
राजस्थान में 52 प्रतिशत जनसंख्या ओबीसी
राज्य में 52 प्रतिशत जनसंख्या ओबीसी की है, जिसमें 72 जातियां शामिल हैं। इसलिए राज्य में ओबीसी को 6 प्रतिशत आरक्षण बढ़ना चाहिए। ओबीसी को जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की सुविधा नहीं है। मेडिकल और इंजीनियरिंग में ओबीसी वर्ग को 21 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा है।
ओबीसी में इन जातियों का दबदबा
ओबीसी वर्ग में आरक्षण का लाभ यादव, चारण, माली, जाट, सोनी, वैष्णव, कायमखानी और विश्नोई समाज को मिल रहा है। जाट नेता राजाराम मील का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करना स्वागत योग्य है, लेकिन इसमें क्रीमी लेयर को बाहर रखना अनुचित है। इसके खिलाफ केंद्र सरकार के समक्ष विरोध कर पुनर्विचार की मांग की जाएगी।
जाट नेता एवं पूर्व मंत्री चंद्रभान ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण का कांग्रेस का स्टैंड सही था। क्रीमी लेयर की शर्त से वे सहमत नहीं हैं। स्पष्ट राय यह है कि शिक्षा प्राप्त करने के मामले में क्रीमी लेयर की शर्त नहीं होनी चाहिए। सरकार का निर्णय अब आंशिक रूप से ही लागू हो पाएगा।
समृद्धों को हटाना जरूरतमंदों के हित में
ओबीसी के छात्रों को मिलेगा न्याय
वर्तमान में चल रही आरक्षण व्यवस्था के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग के ऐसे लोग, जो सामान्य वर्ग के चयनित छात्रों से अधिक योग्यता होने के बावजूद आरक्षण का लाभ लेने से वंचित रह रहे थे, ऐसे छात्रों के साथ न्याय हुआ है। कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहना चाहता हूं कि जब देश में सामान्य वर्ग की जनसंख्या ही 45 से 46 प्रतिशत मानी गई है तो आरक्षण भी उतना ही होना चाहिए।
राज्य में ओबीसी वर्ग को केवल 21 प्रतिशत ही मिल रहा है, जनरल की आबादी 45 प्रतिशत के करीब है, लेकिन उनके लिए आरक्षण 51 प्रतिशत है। क्रीमीलेयर का हटना भी ओबीसी वर्ग के जरूरतमंदों छात्रों के हित में होगा। प्रदेश में ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था भी इसी तरह से बदल जाए तो एसटीएससी में शामिल होने की मांग कर रही जातियां संघर्ष बंद कर देगी।
- प्रो. आर.डी.गुर्जर
बुद्धिबल के आधार पर हक मांगने वाले हताश होंगे
पहले देश में छोटे-छोटे कबीले होते थे, जो अपने हितों के लिए लड़ा करते थे। उन लोगों में तो शिक्षा का अभाव था। अब जब पूरा विश्व क्वालिटी एजुकेशन पर जोर दे रहा है तो हमारा देश उसी शिक्षा के बंटवारे में लगा है। इस तरह के निर्णय से बुद्धिबल के आधार पर हक मांगने वाले हताश होंगे, वहीं जिस उच्च शिक्षा के लिए बुद्धिकौशल दाव पर होता था, वह मारा जाएगा।
-डॉ. शिव गौतम, प्रोफेसर व हैड, मनोरोग चिकित्सालय
उच्च शिक्षा में आरक्षण खत्म हो
आरक्षण के माध्यम से चुनकर आने वाले डॉक्टर व इंजीनियर देश में सेवाएं देंगे तो सेवाओं की गुणवत्ता में कमी आएगी। बेहतर यही होगा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण ही खत्म हो जाए। ऐसा होने पर असली काबिलियत का पता चलेगा।
- डॉ. मुकेश मित्तल, अध्यक्ष जयपुर रेजिडेंट एसोसिएशन
जिंदगी से खिलवाड़ होगा
उच्च शिक्षा में आरक्षण बढ़ने से बुद्धिजीवी लोगों की परेशानी बढ़ जाएगी। सरकार को चाहिए कि वह आरक्षण के बजाए दूसरी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे। अन्यथा स्वास्थ्य क्षेत्र में तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
-जितेन्द्र चावला, सचिव, मेडिकल प्रेक्टिशनर्स सोसायटी