एक नजरिया यह भीजिस तरह प्रजातंत्र में दलबदल अनिवार्य है वैसे ही कुशल अर्थव्यवस्था में महंगाई भी बहुत जरूरी है। यह बात अपने पल्ले नहीं पड़ती कि लोग मूल्य वृद्धि को लेकर इतना क्यों रोते-धोते हैं। दिन और रात जीवन में आवश्यक है। रात आती देखकर हमने किसी को आज तक टसुए बहाते नहीं देखा है।
उल्टे खुश होते हैं लोग। चलो एक और दिन सही-सलामत गुजर गया। न सिटी बस ने कुचला और न बॉस ने हड़काया। भीड़ों और इन यांत्रिक यमदूतों के जंगल से वनपीस सही-सलामत घर लौटना कोई कम उपलब्धि है क्या? ज्यादा से ज्यादा उनकी एक ही इल्तिजा होती है।
‘हे प्रभु! हमें पॉवरकट से बचाए रखना, वर्ना जाड़ा या गर्मी नहीं तो उमस में तड़प-तड़पकर गुजरेगी रात। ऊपर वाले इंसान या भगवान से सबको यही शिकायत रहती है। उसके कान, नीचे वाले की फरियाद के लिए हमेशा बंद रहते हैं। शायद इसीलिए पूजा-कीर्तन हों या धरना प्रदर्शन, अक्सर माइक लगाकर ही होते हैं।
फिर भी इन प्रतिकूल हालात में, रुआंसा भले हो, रोता तो कोई नहीं है। अपना तो यही कहना है कि कीमतें बढ़ें तो हमें खुश होना चाहिए। अर्थशास्त्री बताते हैं कि मूल्य वृद्धि विकास का महत्वपूर्ण लक्षण है। दोनों का चोली-दामन का साथ है। अपनी दाल-सब्जी छिन रही है तो क्या हुआ, बच्चों के सुखद भविष्य का तो इंतजाम हो रहा है। सब कहते हैं कि ईमानदारी की नमक-रोटी का स्वाद ही अलग है।
ऐसे भी दाल-सब्जी जैसी फिजूलियात में रखा क्या है? अपना जीवन दर्शन ही सादा जीवन, उच्च विचार का है। अगर आपका नहीं है तो होना चाहिए। यह नमक-रोटी खाकर ही मुमकिन है। जितनी भी बार कोई सूखी रोटी को दांतों से चबाता है, उतना ही महंगाई को कोसता है। इस प्रक्रिया के अंत तक उसके मन की सारी मलिनता मिटती है। उसके विचार पूरी तरह निर्मल और शुद्ध हो जाते हैं।
ऐसे भी कोई सोचे? हजारों, लाखों ने पता नहीं क्या-क्या त्याग किए, तब जाकर हमारे देश को अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा मिला। हमारे राजनेताओं ने उसूल, ईमानदारी, ईमान, आदर्श, आत्म-सम्मान वगैरह-वगैरह त्यागा तो मंत्री पद पाया। बिना कीमत चुकाए कुछ भी मिलता है क्या? सबकी अपनी कीमत है। इसी तरह विकास की भी कीमत है। विकास को इंतजार है, हमारे नन्हे से त्याग का। मूल्य वृद्धि से हमें हार नहीं माननी चाहिए।
बस छोटा सा त्याग करना है। हमें दाल-सब्जी छोड़कर नमक-रोटी अपनाना है, तभी आगे की पीढ़ियां एक समृद्ध मुल्क में रह सकेंगी। बियर-पिज्जा, बर्गर, केक, आइस्क्रीम में नहाएंगी-धोएंगी। इसीलिए जब भी कीमतें बढ़ती हैं, हमें संतोष होता है। मुल्क तरक्की की ओर अग्रसर है। हम विकास की नींव के पत्थर हैं। देश की शानदार तरक्की की इमारत सिर्फ हमारी बुनियाद पर टिकी है।
जब हम बढ़ती महंगाई, विकास और उसमें त्याग की भूमिका का जिक्र करते हैं, तो मित्र हमारा मजाक उड़ाते हैं। एक कहता है, ‘कहां है विकास। वही गटर, गड्ढेदार सड़क, गायब बिजली-पानी, गुम कानून व्यवस्था, बढ़ती कीमतें, घटती क्रयशक्ति, हमें तो मूल्यों के अलावा कहीं तरक्की नजर नहीं आती है। दूसरा उनका समर्थन करता है यह कहकर कि जो बढ़-चढ़कर विकास की बातें करते हैं, वे अपने खुद के विकास में तल्लीन हैं। कदाचार के कुतुबमीनार खड़े कर रहे हैं यह लोग। हमारे मुल्क में अगर कुछ कायदे से फल-फूल रहा है तो सिर्फ भ्रष्टाचार।
उनको गलतफहमी है कि उन्होंने अपने वास्तविकता के तर्क से हमें लाजवाब कर दिया है। वह जानते नहीं हैं। अपन स्कूल और उसके बाद भी अच्छे बहसिये रहे हैं। नहीं तो यूनियन के पदाधिकारी कैसे होते। वह तो अपनी पार्टी की सरकार है, हमें हर हाल में बचाव करना है उसका। हम उन्हें बताते हैं कि गंगा का उद्गम हिमालय से है। जाहिर है कि विकास की गंगा भी चोटी के नेता-अफसरों से होते हुए, धीरे-धीरे जनता तक पहुंचेगी। मूल्य वृद्धि से उसका मुबारक सफर शुरू हो गया है। बस, थोड़े ही वक्त की बात है। सब कुछ बदल जाएगा।
हमारे दोस्त जवाब में स्वरचित तुकबंदी सुनाते हैं-
बचा नहीं जीवन में कोई सेलीब्रेशन, चलो, अब मनाएं हम बढ़ता इंफ्लेशन।
घटिया कविता-शायरी का नतीजा खामोशी है। अपनी जुबान पर भी ताला लग जाता है।
-लेखक व्यंग्यकार हैं।