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बड़ी गिलहरी से बढ़ रहे हैं जंगल

होशंगाबाद.इस गिलहरी को देखने देश-विदेश से पर्यटक व सैलानी आते हैं। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में इसकी अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों से इनकी संख्या लगातार बढ़ रही हैं। यह फलों के बीजों को यहां-वहां फैलाकर जंगल के विस्तार व विकास में वनजीवियों के साथ सबसे महत्वपूर्ण योगदान भी दे रही हैं। सुखद बात यह भी है कि इनका शिकार नहीं होता।

केवल होशंगाबाद में है यह गिलहरी :

ज्वाइंट स्कीरल प्रजाति की उपप्रजाति रेटूफा इंडिका सेंट्रलिस यानी बड़ी गिलहरी का रंग सुनहरा भूरा और काला होता है। यह ढाई फीट तक की होती है। इसे वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम की अनुसूची भाग दो में रखा गया है। यह गिलहरी मप्र में केवल होशंगाबाद जिले के सतुपड़ा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में ही पाई जाती है। यह गिलहरी पचमढ़ी, पनारपानी, नागद्वारी, बोरी, चूरना, आदि स्थानों पर अधिकता में है।

करीब डेढ़ सौ स्थानों पर इन्हें चिह्न्ति भी किया गया है। चूहे परिवार की यह गिलहरी शाकाहारी होती है। यह अपना घोंसला ऊंचे व सघन वृक्षों पर बनाती है। अभी इनका प्रजनन काल चल रहा है। इसका मुख्य भोजन अजरुन, आम, जामुन, पीपल, गूलर के फूल व फल हैं।

इसका पर्यावरण में अहम रोल है :

यह गिलहरी सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के ऐसे वृक्षों को रहवास बनाती है, जिनके छत्र एक दूसरे से मिले होते हैं, ताकि यह आसानी से एक से दूसरे वृक्ष पर जा सकें। इन्हें लगातार खाते रहने की आदत होती है। चूहे प्रजाति की होने से दांत बहुत जल्दी बढ़ते हैं, इसलिए ये वृक्षों के कड़े फल व छाल को कुतरती रहती है, ताकि दांत घिसते रहे। फूल व बीज खाने के साथ यह इन बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलाकर महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कार्य भी करती है।

कम तापमान और हाई माईस्चर वाले वनों में ही यह गिलहरी रह सकती है। पचमढ़ी के जंगलों में अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियां व मौसम होने से बड़ी गिलहरी यहां प्रचुरता में है। इनका शिकार नहीं होता है। अन्य स्थानों के वनों के विकास के लिए इसको वहां ले जाने संबंधी कोई प्रस्ताव फिलहाल नहीं है।

एसएस राजपूत, क्षेत्र संचालक सतपुड़ा टाइगर रिजर्व होशंगाबाद।





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