चिचोली.वनवासी समाज की जीवन रेखा कहलाने वाली ‘महुआ’ की फसल इन दिनों शबाब पर है। जंगलों से गुजरते ही महुआ के फूलों की खुशबू दूर से ही महसूस की जा सकती है। इन्हें बच्चे, बूढ़े एवं महिलाएं सोने के समान बीनते हैं।
बैतूल जिले का महुआ सारे देश में प्रसिद्ध है। चिचोली क्षेत्र में महुए के घने जंगल होने के कारण यह आदिवासियों की आय का प्रमुख साधन है। अप्रैल की शुरुआत होते ही महुआ के फूल गिरने लगते है, जिसे इकट्ठा करके व्यापारियों के माध्यम से बेचा जाता है। इसी आय से आदिवासी समाज जीविकोपार्जन के संसाधन जुटाता है।
वनोपज के जानकार श्याम राठौर ने बताया कि इस वर्ष महुआ का रिकार्ड उत्पादन होने की उम्मीद है, हालांकि मौसम की मार ने इस फसल को कुछ हद तक प्रभावित किया है, लेकिन फिर भी महुए की अच्छी आवक हो रही है। पेड़ों के नीचे से महुआ बीनती फूल्लोबाई, सुनंदा भागीरथी आदि ने बताया कि वे सब-मिलकर २क्-२५ बोरे महुआ इकट्ठा कर लेते हैं। वर्तमान में इसका बाजार भाव कम है, जब दाम बढेंगे तभी बेचेंगे।
बहुपयोगी है महुआ का पेड़: जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला महुआ का पेड़ बहुपयोगी होता है। इसके फूल से मुख्यत: शराब बनाई जाती है। फूल झड़ने के बाद बीज बनता है, इसे ‘गुल्ली’ कहते हैं। गुल्ली का तेल दवाई के रूप में उपयोग किया जाता है। आदिवासी लोग इसी तेल को खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करते हैं। गुल्ली से तेल निकालने के बाद इसकी खली का उपयोग कीटनाशक एवं साबुन बनाने में किया जाता है। महुआ के पेड़ की लकड़ी का प्रयोग ईंट-भट्टों में ईंटें पकाने में किया जाता है। यही कारण है कि जंगलों से धीरे-धीरे महुआ के पेड़ कम हो रहे हैं।
कैसे बीना जाता है महुआ :
जानकारों के अनुसार पेड़ से महुआ का फूल पूरी तरह से पककर भोर के समय ही गिरता है, इसके लिए पेड़ों के नीचे साफ-सफाई की जाती है। कुछ लोग इन फूलों को एकत्रित कर घरों में सुखाते हैं तो कुछ पेड़ों के नीचे ही सूखने के लिए छोड़ देते है। पूरी तरह से सूख चुका महुआ ही अच्छी कीमत देता है, जंगलों में तड़के ही बच्चे, बूढ़े एवं महिलाएं विशेष प्रकार की बांस से बनी टोकनी में महुआ चुनते दिखाई देते हैं।
बहरहाल, जिले में चुनावी शोरकुल से दूर वनवासी समाज इन दिनों अपने जीविकोपार्जन के साधन जुटाने में लगा है। महुए की फसल के अच्छी स्थिति में होने के कारण इनके चेहरों पर खुशियां झलकती हैं।