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आरडीए के प्लाट गायब

रायपुर. दो दशक पहले आरडीए ने अपनी कालोनियों में कुछ प्लाट विलुप्त कर दिए। गायब किए गए कुछ प्लाट सालों बाद अब अचानक उसी जगह पर फिर मिल गए। समझा जाता है कि विलुप्त करने के नाम पर आरडीए में करोड़ों की जमीन की अफरातफरी कर दी गई। जांच में बड़े भूमाफिया के भंडाफोड़ का अंदेशा है।

आरडीए की देवेंद्रनगर, शैलेंद्रनगर वल्लभनगर और टैगोरनगर जैसी कई पाश कालोनियों में बेशकीमती भूखंडों की अफरा-तफरी के मामले सामने आने लगे हैं। दरअसल आरडीए की कालोनियों में दो-ढाई दशक पहले कुछ प्लाट आश्चर्यजनक ढंग से नक्शे से गायब कर दिए गए। इनमें से कुछ प्लाट सालों बाद उसी स्थान पर वापस मिल गए। जो प्लाट नहीं मिले, माना जा रहा है कि उनकी अफरातफरी कर दी गई। शक है कि यह काम उन लोगों ने किया, जिन्हें आरडीए में जमीन का कीड़ा माना जाता रहा है।

दैनिक भास्कर को ऐसे प्लाटों की जानकारी मिली थी जो बरसों पहले रिकार्ड से गायब हुए, लेकिन अचानक मिल गए। इसकी पड़ताल के बाद सनसनीखेज बातें सामने आ रही हैं।

देवेंद्रनगर के सेक्टर-2 में प्लाट नंबर ई-73 को बरसों पूर्व रिकार्ड से गायब कर दिया गया। यह कहां गया, इस बारे में अफसर चुप हैं। इसी कालोनी के सेक्टर-2 में ही ई-73 से लगे ई-76 का किस्सा भी ऐसा ही है। यहीं बी-30, बी-38, सी-83, सी-50, सी-21, डी-22 और ई-50 नंबर के प्लाट भी इसी तरह विलोपित किए गए। लेकिन सी-36, सी-और 14-ए फिर अस्तित्व में आ गया। शैलेंद्रनगर में एक नर्सिग होम और उससे लगे नामी कारोबारी के प्लाट का नंबर एक ही था। बरसों बाद यह मामला उजागर हुआ। तब आरडीए ने प्लाटों को ए और बी में बांट दिया।

नगर निवेश भी हरकत में
आरडीए में हुए इन कारनामों की भनक टाउन प्लानिंग को भी है। हाल ही में टाउन प्लानिंग के ज्वाइंट डायरेक्टर जाहिद अली ने आरडीए के सीईओ से पूछा है कि देवेंद्रनगर योजना के अंतर्गत सेक्टर-2 के अनुमोदित लेआउट में प्लाट-नं. ई-73 किन परिस्थितियों में पहले विलोपित कर दिया गया और अब दोबारा किस आधार पर मिल भी गया। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता, प्लाट रिकार्ड में दर्ज कैसे होगा।

बहानेबाजी और असलियत
आरडीए के एक अफसर ने बताया कि ज्यादातर कालोनियां जहां बसी हैं, वहां पहले दलदल या खेत थे। इन्हें आरडीए ने डेवलप किया। कुछ अफसर इसी बहाने बचने की कोशिश में हैं कि सर्वे के समय नापजोख और प्लाटिंग के दौरान नापजोख में अंतर आ गया। इसीलिए 1984 से पहले प्लाट ई-73 और ई-76 विलोपित कर दिए गए। दो प्लाट कहां गए? इस पर उन्होंने कहा कि इंजीनियर की गलती से ऐसा हो सकता है।

टेप गलत ढंग से पकड़ने की वजह से भी नाप में 500-600 फीट तक अंतर आ सकता है। संभव है, प्लाट इसलिए कम पड़ गया। अफसरों के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि नापजोख में फर्क था तो अब 73 नंबर का प्लाट कैसे मिल गया? बहरहाल, इसका प्रपोजल टाउन एंड कंट्री प्लानिंग को भेजा गया है। पुराना ले आउट होने की वजह से आरडीए ने बोर्ड की बैठक में इस प्लाट ई-73 को अस्तित्व में लाने की मंजूरी दे दी।

करोड़ों का गोलमाल
आरडीए की कालोनियों में 1000 वर्गफीट के प्लाट की कीमत से 10 लाख से 20 लाख रुपए तक है। इस लिहाज से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दर्जनों प्लाटों की अफरातफरी कर भूमाफिया ने करोड़ों का खेल कर दिया। शक है कि इसमें भूमाफिया के साथ-साथ आरडीए के कुछ अफसरों की भी मिलीभगत होगी। शिकायतें ऐसी भी हैं कि कुछ अफसरों ने मिलीभगत से प्लाट के निर्धारित आकार से ज्यादा जमीन कुछ लोगों को नापकर दे दी।

1984 के नक्शे में 73 या 76 नंबर ही नहीं, कई प्लाटों के नंबर डिलिट कर दिए गए। नंबरिंग के दौरान गड़बड़ी की गई, जिसे नंबर डिलिट कर सुधार लिया गया।
-श्याम बैस, अध्यक्ष, आरडीए

कुछ नए प्लाट मिले हैं, जो पुराने नापजोख की गड़बड़ी को दर्शाते हैं। इन्हें लेआउट में नगर निवेश विभाग के जरिए जुड़वाने का प्रयास हो रहा है।
-वर्धमान सुराना, उपाध्यक्ष, आरडीए

लेआउट से गायब प्लाट अचानक कैसे मिल रहे हैं? इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है। यह तकनीकी मामला है।
-आरएस दीक्षित, राजस्व अधिकारी, आरडीए





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