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आम आदमी को मिलेगी राहत

कोटा. हाईकोर्ट के निर्देशों की पालना में शहर के 150 छोटे बड़े मैरिज प्लेसेज को नगर निगम में अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा, अभी यह वैवाहिक स्थल नियमों के विपरीत संचालित हो रहे हैं। इससे निगम को राजस्व नुकसान तो हो रहा है साथ ही पर्यावरण व आम जन के लिए स्वास्थ्य से भी खिलवाड़ किया जा रहा है।

निगम प्रशासन की ओर से प्रदूषण फैलाने वाले मैरिज प्लेसेज पर कार्रवाई के लिए भेजे बायलॉज को राज्य सरकार ने स्वीकृत कर लिया लेकिन, निगम प्रशासन उसके अनुसार कार्रवाई नहीं कर पाया।

नगर निगम द्वारा करवाए गए सर्वे के अनुसार शहर में करीब 150 छोटे-बड़े मैरिज प्लेसेज व वाटिका है। जो मुख्य मार्गो, कॉलोनियों व चौराहों पर स्थित है। नियमों के तहत वैवाहिक स्थल का निगम में रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। जिसका शुल्क पांच हजार रुपए तक है। प्रति समारोह के एक हजार रुपए भी निगम के कोष में जमा करवाने होते हैं। निगम दो माह पहले प्रदूषण के बने बॉयलाज व रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता को लागू करता है तो उसे साढ़े सात लाख का राजस्व मिलेगा, साथ ही शहर को प्लास्टिक व प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी।

एक वर्ष पहले बनाए थे बायलॉज
नगर निगम ने एक साल पहले राज्य सरकार को प्रदूषण फैलाने वाले मैरिज हॉल व अन्य समारोह स्थलों पर कार्रवाई करने के लिए बायलॉज बनाकर भिजवाए थे। सरकार ने दो माह पहले ही उन पर स्वीकृति की मोहर लगा दी। इसके बावजूद निगम प्रशासन हरकत में नही आया। नतीजा एक भी वैवाहिक स्थल का रजिस्ट्रेशन नही किया गया। अन्य प्रतिबंध लगाना तो अलग बात है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद निगम अधिकारी 15 दिन में सभी वैवाहिक स्थलों को नियमों की सीमा में बांधने का दावा कर रहे हैं।

निगम की तैयारी पूरी है। रजिस्ट्रेशन के फार्म छपकर तैयार है। वैवाहिक स्थलों का सर्वे भी कराया जा चुका। नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जाएगी।’
—सतीश बारूपाल, आयुक्त (राजस्व), नगर निगम

अभी तक न तो किसी ने रजिस्ट्रेशन के लिए कहा और न ही किसी ने रजिस्ट्रेशन करवाया। हाईकोर्ट का फैसला है। पालना तो करनी पड़ेगी। लेकिन इससे मैरिज हॉल संचालकों पर अतिरिक्त भार जरूर पड़ेगा। मैजिर हॉल का किराया बढ़ेगा।’
—अली हुसैन, मैरिज हॉल संचालक

रजिस्ट्रेशन शुल्क तो स्थानीय निकायों को लेना ही चाहिए इसमें तो मैरिज हॉल संचालकों को भी आपत्ति नही होगी लेकिन प्रति समारोह हजार रुपए का नियम लागू नही हो तो अच्छा है।’
—हुकुमचंद जैन काका, मैरिज हॉल संचालक

सरकार द्वारा लगाया जाने वाला शुल्क संचालक तो जमा करवा देंगे लेकिन भार जनता पर पड़ेगा। जगहों का किराया बढ़ जाएगा। पार्किंग की समस्या के लिए भवन निर्माण से पहले संबंधित निकाय को सोचना चाहिए था।’
—राजेश बिड़ला, अध्यक्ष, माहेश्वरी प्रगति मण्डल दादाबाड़ी

मौजूदा कमियां >>

पार्किग का अभाव
समारोह में आने वाले लोग वाहनों को सड़क पर खड़ा कर देते है। इससे इनके आसपास रहने वालों तथा इधर से गुजरने वाले लोगों को परेशानी होती है। यातायात पुलिस भी कार्रवाई नही करती। श्रीजी मैरिज हॉल, वाईकेएस बैंक्वेट हॉल, मिडनाइट, रोटरी बिनानी सभागार, पंजाब सभा भवन, फूलकंवर, परिणय प्लाजा, गणपति बैंक्वेट हॉल, विजयवर्गीय मांगलिक भवन, माहेश्वरी भवन, लायन्स भवन, गुजराती समाज भवन व अणुव्रत भवन आदि में यही हाल है।

वेस्ट डिस्पोजल सिस्टम नहीं
अधिकांश वैवाहिक स्थल में वेस्ट डिस्पोजल सिस्टम नहीं है। कई मैरिज हॉल नाले में, नहर में व चंबल नदी में गंदगी फैंक रहे हैं। कॉलोनियों में संचालित वैवाहिक स्थल की गंदगी नालियों व गलियों में दुर्गंध का भभका मारती है इससे आम जन के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण को भी खतरे का अंदेशा बना है। इसके बावजूद रोक थाम नही हो रही।

ध्वनि और वायु प्रदूषण
शादी समारोह में तेज साउण्ड सिस्टम आम हो गया। इससे कोचिंग इलाकों में रहने वाले विद्यार्थियों के साथ-साथ स्थानीय बाशिंदों को भी परेशानी होती है। लेकिन सुनवाई करने वाले तो नजर ही नही आते।





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