स्वतंत्रता प्राप्ति में बड़े-बड़े नेताओं की अपनी भूमिका रही है, लेकिन सामाजिक न्याय के संदर्भ में डॉ. भीमराव आंबेडकर का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। डॉ. आंबेडकर का जीवन संघर्षो का एक सफरनामा है। इतने पढ़े-लिखे होने के बावजूद एक गरीब परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कांशीराम और मायावती जैसे राजनेताओं ने दलितों के आंदोलन को नई दिशा देने का प्रयास किया। काफी हद तक वे कामयाब भी रहे, लेकिन आंबेडकर का दृष्टिकोण इनसे पृथक था।
उन्होंने अपने विचार और कार्यशैली से किसी भी स्तर पर दलित समाज को जो दिया, वैसा योगदान राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखते हुए कोई नहीं दे सकता। वे चाहते थे कि भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए देश और समाज में दलितों का सम्मान बढ़े और उन्हें वांछित अधिकार मिल सकें।
अंतत: डॉ. आंबेडकर का संघर्ष रंग लाया। दलित कामयाबी की राह पर अग्रसर हुआ। शिखर पर पहुंचा, लेकिन धीरे-धीरे दलित आंदोलन में भटकाव आया। वह सामाजिक परिवर्तन को ताक पर रखकर समानता, भाईचारा और दलित आंदोलन को भूल बैठा और अवसरवादी समझौते करते हुए टुकड़ों में बंटता गया। इसके बावजूद दलित स्वर मुखर एवं देश की भागीदारी में शिखर स्वर है। अभी भी दलितों में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है।
अन्य वर्गो की दलितों के प्रति सहानुभूति कभी परिलक्षित नहीं हुई। आज का दलित नेतृत्व भी सामाजिक शोषण, आर्थिक दुर्दशा और मानसिक उत्पीड़न का शिकार है। ऐसे में कैसे अपेक्षा करें कि दलित अपनी अस्मिता को बचाकर रख सकता है? दलित अलग-अलग प्रतिध्रुव बना रहे हैं। दलित ही आपस में कई फांकों में विभक्त हैं, क्योंकि आज की विषम परिस्थितियों में दलित नेतृत्व के पास न तो वैचारिक सोच है, न ही सामाजिक ढांचे को मापदंड में लाने का पैमाना जो डॉ. आंबेडकर की सोच को अंजाम दे सके।
अंग्रेजों के शासनकाल में देश में 2000 जातियां थीं। इस कारण नेतृत्व में डॉ. आंबेडकर सबल थे। आज जातियां बंटकर 4000 हो गई हैं। अत: कहने का तात्पर्य यह है कि उतने ही संवेग में दलितों को संघर्ष करना होगा, तभी इसका लाभ मिल सकेगा। इसीलिए आंबेडकर यही चाहते थे कि देश में जाति न रहे, इंसान रहे।
फरवरी 1933 में इंग्लैंड के गार्जियन समाचार पत्र और अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स का एक प्रतिनिधि भारतीय नेताओं का इंटरव्यू लेने आए। गांधी, जिन्ना और डॉ. आंबेडकर ने उन्हें मिलने का अलग-अलग समय दिया। रात्रि नौ बजे से 11 बजे के बीच समय दिए जाने के बावजूद गांधी और जिन्ना सोए हुए मिले। दो बजे दोनों संवाददाता डॉ. आंबेडकर के पास पहुंचे। उन्होंने प्रश्न किया कि आप इतनी रात तक जाग रहे हैं, जबकि गांधी और जिन्ना तो हमें सोए हुए मिले।
डॉ. आंबेडकर ने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया कि वे सोए हुए हैं, क्योंकि उनका समाज जाग रहा है और मैं इसलिए जाग रहा हूं क्योंकि मेरा समाज सोया हुआ है। वे अनभिज्ञ हैं, वे उनकी तरह जागरूक नहीं हैं। कहने का आशय है कि डॉ. आंबेडकर के विचारों के अनुकूल दलित नेतृत्व को नई दिशा देने वाला सही कर्णधार अभी दलितों में नहीं आ सका है।
डॉ. आंबेडकर ने अपनी भोगी हुई पीड़ा से दलितों को दूर रखा। वे स्कूल में पढ़ नहीं सके, लेकिन दलितों को शिक्षा के अधिकार दिलाए। जो उन्होंने महसूस किया, उससे दलितों को दो-चार नहीं होने दिया लेकिन आंबेडकर को मानने वालों से कैसा व्यवहार किया जाता है, यह सर्वविदित है। डॉ. आंबेडकर का कहना है कि हमारा राष्ट्र हजारों जातियों में बंटा हुआ है, इसलिए हम एक राष्ट्र नहीं हो सकते। जब तक वर्णवादी व्यवस्था, जातिवाद कायम है, दलितों का उत्पीड़न एवं अत्याचार कम नहीं हो सकते। इसी मुद्दे पर उन्होंने गांधी से बड़ी मुश्किल से समझौता किया।
आंबेडकर की सोच थी कि संगठित होकर ही दलित सरकार बना सकते हैं, क्योंकि सुखभोगी सभी वर्ग अलग-अलग धर्मो में विभक्त हैं। आज भी अनुसूचित वर्ग संगठित नहीं है, इसलिए तीसरी ताकत का गठन नहीं हो पा रहा है। कांशीराम के प्रयासों से दलित न केवल सत्ता में आए, बल्कि राष्ट्र की मुख्यधारा में भी शामिल हो गए, लेकिन उनके मुक्ति के द्वार नहीं खुले। यही कारण है कि दलित वर्ग सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त अंतर्विरोधों को कम नहीं कर सका और कष्ट भोगने को मजबूर है।
यद्यपि बाबासाहब आंबेडकर ने दलितों को शिक्षा, संगठन और संघर्ष का नारा दिया, डॉ. आंबेडकर को कानूनमंत्री से नवाजे जाने का श्रेय केवल उनकी काबिलियत को जाता है, इसलिए जहां भी उन्हें अवसर मिला, दलित विकास की संरचना लागू करते गए, चाहे वह समय गोलमेज परिषद का हो, संविधान निर्माण की बात हो या गांधी से टकराव हो। लेकिन वे यह भी जानते थे कि किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन कर वे दलितों का विकास नहीं कर सकते।
आज भी दलित निष्ठावश डॉ. आंबेडकर का दिली सम्मान करते हैं किंतु वोट दूसरी पार्टी को देते हैं। दलित इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि आज नहीं तो कल यह ब्राrाणवादी और दलित गठबंधन सभी को दिखाई देगा। इसलिए वे न तो बसपा को वोट देते हैं, न मायावती को, वे तो बाबा साहब के अहसानों को चुकाने के लिए विवश हैं। डॉ. आंबेडकर द्वारा निर्मित प्रावधानिक संविधान के उपभोग करने के बाद दलितों ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि उनका समाज कहां है, इसलिए दलित राजनीति दिशाहीन हो गई है।
-लेखक टिप्पणीकार हैं।