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जातिरहित भविष्य की चाह

दृष्टिकोण. कहा जाता है कि राजनीति को कानून की चौखट पर कदम नहीं रखना चाहिए, लेकिन भारत में राजनीति हर स्तर पर कानून को मात देने की कोशिश करती है। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का ओबीसी कोटा मामले पर हालिया निर्णय दो विपरीत विचारधाराओं के बीच समझौता करने का प्रयास है।

एक ओर जहां कोर्ट ने कानून के 93वें संशोधन का अनुमोदन किया है और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत कोटा देने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर कोर्ट ने कोटे से क्रीमीलेयर को अलग करके और जो वर्ग इसमें शामिल किए गए हैं, उनके बारे में हर पांच वर्ष में समीक्षा करने का निर्णय देकर इसे तर्कसंगत बनाने का प्रयास भी किया है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उन राजनेताओं के लिए चेतावनी भी है, जो आरक्षण की होड़ में ज्यादा से ज्यादा वर्गो को बगैर अंतर देखे शामिल करवाना चाहते हैं।

लेकिन इन निर्णय की दो सीमाएं हैं- पहली, उसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दे अछूते रह गए हैं, जैसे क्या गैर पोषित स्वायत्त संस्थाओं में भी आरक्षण का दायरा बढ़ाया जा सकता है? पिछड़ेपन का क्या आधार होना चाहिए? क्रीमीलेयर की परिभाषा क्या है? क्या कोटा में किसी नए वर्ग का सम्मिलन न्यायसंगत होगा? और दूसरे, कोर्ट ने इसे नए मामले के तौर पर स्वीकार नहीं किया है और इसके पहले के सिद्धांत पर इस मामले की समीक्षा नहीं की है। आरक्षण का उद्देश्य क्या है? क्या यह भेदभाव दूर करने का तरीका है?

क्या यह ऐतिहासिक अन्याय का हर्जाना है? या फिर यह विभिन्न वर्गो में शक्ति का बंटवारा है? कौन से वर्ग को शामिल किया जाना चाहिए, यह बात इस पर निर्भर करनी चाहिए कि हम आरक्षण का उद्देश्य क्या मानते हैं? लेकिन विभिन्न वर्गो में लोगों को न्याय देने की बजाय आरक्षण अब शुद्ध रूप से ‘पॉवर प्ले’ बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास किया है। सुप्रीम कोर्ट ने हमें याद दिलाया है कि वास्तविक सशक्तीकरण आरक्षण से नहीं, बल्कि सभी के लिए उच्च गुणवत्ता की शिक्षा से आएगा।

लेकिन राजनेता कोर्ट के इस मंतव्य को सम्मान से स्वीकार करने वाले नहीं हैं। इसकी बजाय हम देखेंगे कि राजनेता एक-दूसरे द्वारा इसे बर्बाद करने में लग जाएंगे। पहले तो आरक्षण को सभी निजी संस्थाओं में बढ़ाने के लिए होहल्ला मचाया जाएगा। हालांकि इनामदार मामले में कोर्ट ने पहली बार कड़ा निर्णय लेते हुए निर्धारित किया था कि यदि कोई संस्था राज्य से किसी प्रकार का धन नहीं पा रही है, तो उसे इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसको पढ़ाए?

हाशिए पर पहुंचे समुदायों को निजी संस्थाओं में प्रवेश दिलाने का सबसे अच्छा तरीका उन्हें छात्रवृत्ति देना हो सकता है, लेकिन राज्य उनके सीटों को वर्गीकरण नहीं कर सकता है। अजरुन सिंह पहले से एक बिल लाने की तैयारी में हैं, जो निजी संस्थाओं में सीटों का प्रभावी रूप से वर्गीकरण करेगा। इन तथ्यों को देखते हुए यह बहुत शर्मनाक है कि सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हो रहा है, तो इसकी गुणवत्ता को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।

दूसरा, इसमें राजनीति खेली जा रही है। अब राजनेता क्रीमीलेयर की सीमा में संशोधन करने के लिए शोरगुल मचाएंगे। इसके लिए आय सीमा अभी 2.5 लाख रुपए है। कुछ हद तक इस सीमा में संशोधन हो भी सकता है। लेकिन अभी संकेत यह हैं कि यह संशोधन इस प्रकार किया जाएगा कि वो कोर्ट के निर्णय को प्रभावहीन कर दे। तीसरा राजनीतिकरण होगा उस पद्धति का जिसके आधार पर विभिन्न वर्गो के आंकड़े एकत्र किए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष तौर पर इस बात पर जोर दिया है कि तमाम विकास के बावजूद सौ से अधिक नए समुदायों को ओबीसी वर्ग में जोड़ा गया है, पर इस दौरान किसी भी वर्ग को इससे बाहर नहीं किया गया है। आरक्षण के मामले में लोग अक्सर तमिलनाडु की सफलता का जिक्र करते हैं, जबकि वहां मामला बिलकुल उलटा है। जहां 69 प्रतिशत आबादी आरक्षण पाती है, वहां आरक्षण जरूरतमंद के लिए चलाई गई योजना नहीं रह जाती है। यह तो ऐसा हो गया कि जब पूरा राज्य आरक्षण का हकदार होगा तभी आरक्षण सफल होगा।

आरक्षण में एक और विडंबना यह है कि ओबीसी और दलितों को एक ही वर्ग में रखा गया है, जबकि भारतीय समाज में दोनों ही वर्गो का इतिहास और उनकी मांगें अलग-अलग हैं। अब हर वर्ग इस बात के लिए हंगामा करेगा कि वह पिछड़ा है और प्रक्रिया को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश करेगा, जैसा कि कुछ समय पहले राजस्थान में जाटों ने किया था। चौथा, भाजपा, जो इस बात को लेकर अड़ी हुई है कि अल्पसंख्यकों को आरक्षण नहीं दिया जाए, अपना विरोध जारी रखेगी। इस मामले में कोर्ट के निर्णय पर चर्चा की जा सकती है।

लेकिन भाजपा की स्थिति एक हद तक दिखावे की तरह है। पार्टी ने आरक्षण को पूरी तौर पर स्वीकार करके अपने ही सिद्धांत ‘एक जाति, एक राष्ट्र’ को झुठला दिया है। इस सिद्धांत को वो तभी याद करती है, जब जरूरत होती है। पांचवां, निजी संस्थाओं की नौकरियों में आरक्षण अभी भी बड़ा मसला है, जो अभी सुसुप्त अवस्था में है। लेकिन आने वाले दिनों में राजनीतिक पार्टियां अपना चुनावी हित साधने के लिए इसे उभारेंगी।

इस बात को हमें ध्यान में रखना होगा कि निजी क्षेत्र को भी इससे जोड़ा जाए, क्योंकि विकास की दौड़ में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के लिए कमजोर नीतियां बनाकर हम निजी क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव डालकर उसकी प्रगति को रोक रहे हैं। हम इस बात का दावा नहीं कर सकते कि राजनेता इसमें भी राजनीति नहीं करेंगे।

इसी तरह, हम कोर्ट के निर्णय पर तात्कालिक रूप से चैन की सांस ले सकते हैं, लेकिन यह चैन बहुत क्षणिक होगा। खास बात यह है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी को इस मामले से फायदा मिलने के संकेत नहीं दिखते, बल्कि हो सकता है कि कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां अपने पूर्ण आरक्षण के अनुमोदन पर कुछ समर्थन खो दें। ओबीसी और दलित बड़े पैमाने पर इन पार्टियों का समर्थन करने से रहे, वहीं इस प्रयास में ये दूसरी जातियों का समर्थन भी खो सकती हैं, क्योंकि इन जातियों के पास इन्हें वोट देने की ठोस वजह नहीं है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमें कुछ विशेष वर्गो के लिए सकारात्मक नीतियां तैयार करनी चाहिए। लेकिन आरक्षण के इस तरीके से इन वर्गो का कोई सशक्तीकरण नहीं हुआ। आरक्षण ने ऐसी स्थिति बनाई जहां समुदायों और शिक्षण संस्थाओं के बीच शक्ति प्रदर्शन के चलते गुणवत्ता का बलिदान हो गया। भारतीय शिक्षा प्रणाली सभी स्तरों पर संकट झेल रही है, लेकिन हमारे राजनेता मौलिक बातों पर ध्यान देने की बजाय एक बार फिर अपने को आरक्षण के आत्मघाती विस्तार की ओर ले जा रहे हैं। इस राजनीति से समाज को कोई भी कोर्ट नहीं बचा सकता है। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि क्या हम एक जाति रहित न्याय वाला भविष्य चाहते हैं।

-लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष हैं।





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