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टैक्स झोलाभर, सुविधाएं मुट्ठीभर

इंदौर. इस जानकारी पर शायद ही किसी को हैरत हो कि इंदौर प्रदेश में सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला शहर है। मगर यह शहर हमेशा ही सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। सरकार चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस की, इंदौर में होने वाले अधिकांश विकास कार्यो की कीमत भी किसी न किसी रूप में कमोबेश शहरवासी ही चुकाते हैं। और जब ऐसा नहीं होता, योजनाएं अधूरी पड़ी रहती हैं।

प्रदेश सरकार के कुल राजस्व का एक-चौथाई देता है इंदौर

इंदौर केंद्र व प्रदेश सरकार को सालाना पांच हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर चुका रहा है। 25 लाख की आबादी के लिहाज से यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति 20,१५६ रु. होता है, जबकि प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 19 हजार 700 रु. ही है। हालांकि इसके बदले इंदौर को अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता।

सरकार को पूरे प्रदेश से करीब 14 हजार करोड़ रुपए का राजस्व मिलता है। इसमें से 24 फीसदी (3394.75 करोड़) केवल इंदौर से आता है। शहर से मिल रहा करीब 700 करोड़ रुपए का आयकर और लगभग 800 करोड़ की सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी जोड़ ली जाए तो आंकड़ा करीब 5040 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है, क्योंकि सेंट्रल एक्साइज और आयकर में से 80 प्रतिशत केंद्रीय अनुदान के रूप में प्रदेश को ही मिलता है।

प्रदेश में सबसे ज्यादा टैक्स चुकाने की वजह से यदि इंदौर विकास में प्राथमिकता की अपेक्षा करे तो वह गलत नहीं है लेकिन हकीकत कुछ और ही है। पिछले कुछ सालों में यदि शहर का तेजी से विकास हुआ है तो उसके पीछे जनभागीदारी, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एवं बीओटी में है।

फिर शहर के खाते में महज वादे या उपेक्षा क्यों?

जनसंख्या अनुपात के अनुसार शहर में 12500 पुलिसकर्मियों की जरूरत है लेकिन हैं केवल 3300। शहर के विस्तार के साथ न तो नए थाने बने और न ही अन्य संसाधन।

चंदननगर, मूसाखेड़ी, बाणगंगा, एअरपोर्ट रोड सहित शहर के ज्यादातर बाहरी हिस्सों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।

नर्मदा का तृतीय चरण महज 125 करोड़ रुपए के अंतर के लिए अटकता रहा, भोपाल के लिए यह काम प्रदेश सरकार ही कर रही है।

करीब 30 प्रतिशत हिस्से में अब भी पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है।

जेएनएनयूआरएम के तहत शहर की विकास योजनाओं में केंद्र 50 प्रतिशत व राज्य सरकार 20 प्रतिशत देता है। शेष 30 प्रतिशत नगर निगम को जुटाना पड़ता है, जबकि उज्जैन नगर निगम को मात्र 10 प्रतिशत मिलाना पड़ता है।

करीब 14 लाख रुपए स्वीकृत होने के बाद भी पांच स्कूल भवन नहीं बन पा रहे हैं, सरकार उनके लिए जमीन ही नहीं ढूंढ पा रही है।

111 में से 41 उपस्वास्थ्य केंद्र आज भी पंचायत या आंगनवाड़ी भवनों में लग रहे हैं।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के अधीन विशेषज्ञों के 28 में से 17 पद रिक्त हैं।

भोपाल को राजधानी पैकेज और उज्जैन को हर 12 साल में सिंहस्थ पर बड़ा पैकेज मिल जाता है। ऐसी किसी प्राथमिकता में इंदौर नहीं।

प्राथमिकता इंदौर का हक

बिजनेस ज्यादा होने की वजह से इंदौर से सबसे ज्यादा राजस्व मिलता है। इस लिहाज से प्राथमिकता मिलना शहर का हक बनता है। एअरपोर्ट, सड़क, आईटी हर मामले में इंदौर को पूरी तवज्जो दी जा रही है, आगे भी जारी रहेगी।

हिम्मत कोठारी, प्रभारी मंत्री





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