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शेखावाटी के ‘दिल’ में बेमानी चीजें

शेखावाटी. खावाटी का परिदृश्य काफी कुछ बदल गया है। इन दस पंद्रह सालों में भीड़-भाड़ काफी बढ गई है धुआं उगलते वाहनों में इजाफा हुआ है । ब्राडगेज का सपना भले ही पूरा न हुआ हो, पर हवाईजहाज उतारने की बात चल रही है। शेखावाटी को ओपनआर्ट गैलेरी का दर्जा प्राप्त है इसके बावजूद पर्यटकों की आवक उतनी नहीं जितनी जयपुर, जैसलमेर, उदयपुर, जोधपुर की तरफ है।

पर्यटक तभी आता है जब अच्छे, मनमोहक पर्यटक स्थलों के साथ-साथ पर्यटन की अच्छी सुविधाएं होती है। अच्छी होटल, अच्छी सड़कें आवाजाही के अच्छे साधन, अच्छी संचार व्यवस्था पर्यटकों को बांधते हैं। शेखावाटी ने इस दिशा में अभीतक प्रगति नहीं की है। दर्शनीय स्थलों को विकसित करने व पर्यटकों को बेहतर सुविधा के लिए करोड़ों की योजनाएं जरूर चल रही है किंतु उस पर अमल नहीं हो रहा है।

कुछ सालों में यहां परिवर्तन हुए हैं, वहीं कुछ नई चीजें इस शहर की सुंदरता चांद पर दाग की तरह लगती है। बेतरतीब से बिछ रहा कंकरीट का जंगल और अतिक्रमण! शिल्पधन्य, कलात्मक हवेलियों का टूटना और वहां महानगरों की तर्ज पर कबूतरों के दड़बों की तरह फ्लैट्स संस्कृति का पनपना! व्यावसायिकता के इस दौर में न केवल शहर का मूल स्वरूप बिगड़ा है अपितु आपसी भाईचारा भी नष्ट हुआ है। जमीन के लिए जमीन पर इंसानों के खून के कतरे बिखर रहे हैं।

शेखावाटी का हर्ट कहलाने वाला सीकर उक्त बेमानी चीजों के आगमन से अपनी विशेषताएं खो रहा है। यहां के लड्डुओं में अब वो स्वाद नहीं रहा जो दस पंद्रह साल पूर्व था। खास चीज सेिए गायब है। नमकीन में किरकिरी है। दूध भी बेस्वाद हो गया है। जो मजा तांगे की सवारी में था वो धूल, धुआं उगलते टेंपुओं में कहां! शहर के खास चोराहे सुभाष चौक, जाटिया बाजार, घंटाघर जो कभी साफ-सुथरे, चौड़े व भीड़ भाड़ रहित थे और यहां बैठकर कभी पुचके (गोलगप्पे) खाने व गप्पे लड़ाने का आनंद लिया जाता था, अब यहां स्थिति एकदम उलट है। भीड़भाड़ बढ गई है।

लोगों के चेहरों पर अब मुस्कराहट नहीं, तनावग्रस्त खामोशी है। यहां के मार्ग संकरे हो चले हैं, वाहनों की रेलमपेल और है दमघोटू वातावरण। शहर के चौराहों की शक्ल खूबसूरत होने की बजाय भद्दी हो गई है। मनोरंजन का साधन सिनेमा अब भी है लेकिन उसका क्रेज अब शेखावटी में इतना नहीं रहा जो बीस वर्ष पूर्व था। मुद्दत हो गई हाउसफुल का बोर्ड टंगे ! नई फिल्में एक सप्ताह भी नहीं टिक पाती। लोगों ने मनोरंजन के साधन और तलाश लिए हैं। कभी रामलीला का भी अच्छा क्रेज था।

इसे देखने के लिए भारी संख्या में लोग जुटते थे। बाहर से आई पार्टियां शहर में रामलीला किया करती थी। प्रारंभ में गोपीनाथजी मंदिर के पास तथा बाद में शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर ये पार्टियां रामलीला किया करती थी। अब रामलीला के पर्दे सिमट गए हैं, सर्कस के तंबू भी उखड़ गए हैं और सिनेमा का मनोरंजन भी लोगों को कम भाने लगा है। कलाओं के प्रस्तुति व कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए यहां महानगरों की तर्ज पर कोई बड़ा रंगमंच अबतक नहीं बन पाया है जिससे यहां की लोक संस्कृति ,लोक कलाएं दम तोड़ रही है, लोक कला लोक संस्कृति कैसे बचेगी? यह चिंता का विषय है।

लंदन, इटली, फ्रांस,ग्रीस आज इसी वजह से दुनियां के पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहे हैं कि वह अपनी धरोहर को बचाए हुए हैं। हमें भी अपना मूल स्वरूप ही जिंदा रख सकता है। जगह सिर्फ भव्य इमारतों, महलों या किलों से नहीं बनती वह लोगों से रिश्तेदारों से पड़ोसियों, अहबाबों से और बनती है सबसें ज्यादा अजीज दोस्तों से और ये सब खूबियां है हमारी शेखावाटी में। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी विरासत को अक्षुण्य रखने का हर संभव प्रयास करें।





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