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विरोध में भी रखें बातचीत की गुंजाइश

विकास मंत्र. फिल्म ‘जोधा अकबर’ का एक खूबसूरत डायलॉग है,

या खुदा मेरे शमशीर के साए में हर बार मेरे अपने ही लोग क्यों आ जाते हैं।

इसे महान मुगल सम्राट अकबर के पात्र से कहलाया गया है। इसमें हम सबकी जिंदगियों की एक कड़वी सचाई भी मौजूद है। अभी तक ऐसा कोई नहीं हुआ है, जिसके दुश्मन न हुए हों, जिसका विरोध न हुआ हो। इस दुश्मनी की शुरुआत होती है हमारे अपने ही लोगों से। तो सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है? यदि आपकी किसी से दुश्मनी होनी होगी, तो वह उसी से होगी, जो आपका कभी दोस्त रहा होगा।

जिसे आप जानते तक नहीं, उससे दुश्मनी कैसे मुमकिन है। जाहिर है कि साथ-साथ रहने से एक-दूसरे की अच्छाइयों और बुराइयों को हम अच्छे से जानने लगते हैं। थोड़ी बहुत ऊंच-नीच के साथ सब कुछ लगभग ठीक-ठाक चलता रहता है। लेकिन जैसे ही दोनों के बीच स्वार्थ आता है, अहं आ जाता है, वैसे ही दोस्ती दुश्मनी में तब्दील होने लगती है।

आपको यह सोचकर अजीब लगता है कि कहां तो दोनों एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह पाते थे और कहां एक पल भी साथ रहने को तैयार नहीं हैं। जिंदगी का यही यथार्थ है, जिसे स्वीकार करना चाहिए। यदि बीज धरती की परत को तोड़कर रोशनी का सामना करता है तो साथ ही उसकी जड़ें अंधेरे की यात्रा के लिए भी निकलती हैं। जो व्यक्ति जिंदगी के इस सत्य से आंख मिलाने की ताकत रखेगा, वह दुश्मनी को दुश्मनी न मानकर उसे विरोध में बदल देगा। वह इससे दुखी नहीं होगा। ऐसे में जब कभी उससे मुलाकात होगी, तो बात होने की गुंजाइश बची रहेगी।

-लेखक समय एवं जीवन प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं।





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