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यह मौका है वित्तीय बदलाव लाने का

दृष्टिकोण. देश दहशत के मुहाने पर खड़ा है। वे दिन लद गए जब इस बात से हमारा सीना फूल जाता था कि हमारा देश रातोंरात खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन गया है और अब हम आयात पर निर्भर न रहते हुए अपने यहां प्रचुर मात्रा में अन्न उपजाने लगे हैं। वर्ष 2004 तक हम खाद्यान्नों का निर्यात करते थे। 2005 में सरकार को लगा कि घरेलू भूख को शांत करने के लिए अपने उत्पादन में सुधार लाना बेहतर होगा और उसने निर्यात को रोकने के लिए स्टियरिंग व्हील को उल्टी दिशा में कुछ ज्यादा ही घुमा दिया। अब हम गेहूं, दालों और खाद्य तेलों के विशुद्ध आयातक बन गए हैं।

वैश्विक आपूर्ति की हालत चिंताजनक है। अब चालीस और पचास के दशक जैसे हालात नहीं रहे, जब खाद्य पदार्थो की बहुतायत थी और भारत सरकार यह मानने लगी थी कि कृषि क्षेत्र को थोड़ा नजरअंदाज किया जा सकता है। खाद्यान्न की कमी के लिए निस्संदेह मौसम का बदलाव मुख्य कारण है। वर्षा की स्थिति डांवाडोल है और तापमान में बड़े पैमाने पर बदलाव होता रहता है। पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें देश और दुनिया को खाद्यान्न उत्पादन की कीमत पर जैविक ईंधन की खेती की ओर धकेल रही हैं।

पानी के स्रोत तेजी से सिकुड़ रहे हैं। बीजों के स्टॉक के पुनरुत्पादन की कमी के चलते भारत संकरित प्रजातियों के उत्पादन की ओर मुड़ गया है। त्रुटिपूर्ण उर्वरक नीति जमीन से फॉस्फेट्स, पोटेशियम जैसे खनिज तत्वों को खींच रही है। न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की कीमत राजनीतिक बहुलतावाद और खाद्यान्न आयात करने में निहित हित की मोहताज होकर रह गई है।

सरकार के दावों के बावजूद भारत के दक्षिणी राज्यों में चावल की ही खपत ज्यादा है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गेहूं की खरीद वहां लगातार घटती जा रही है। नर्मदा नदी के उत्तर में चावल की अधिकता के सापेक्ष खरीदार कम हैं। बाकी भारत में, आय के बढ़ने से आहार में विभिन्नता आती जा रही है, जिससे मांस, मछली, दुग्ध उत्पाद, दूध और फलों की मात्रा भी बढ़ रही है।

भारत सरकार की आर्थिक नीतियां धनवान उपभोक्ता वर्ग के हाथों में ज्यादा से ज्यादा धन थमा रही हैं। दूसरी तरफ, खाद्यान्न का उत्पादन करने वाली आबादी के तबके को बाजार की दखलंदाजी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे थोड़े समय के लिए खाद्यान्न की कीमतों में गिरावट आती है और दीर्घकालिक तौर पर इनके उत्पादन व आपूर्ति पर बुरा असर पड़ता है। सरकार धनाढ्य वर्ग की क्रयशक्ति बढ़ाती जा रही है। इससे समाज के उत्पादक वर्ग पर दबाव बढ़ रहा है।

वर्ष 2005 से एनजीओ की बैठकों में बुद्धिजीवी इस बात पर संदेह जताते चले आ रहे हैं कि ‘खाद्य सुरक्षा’ पर चर्चा की अब प्रासंगिकता बची है या नहीं। इन संस्थाओं में ज्यादा प्रभावी लोगों ने यह तर्क देना शुरू कर दिया कि खाद्य सुरक्षा पर विचार-विमर्श प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन ‘खाद्य सुरक्षा’ के दायरे में न सिर्फ खाद्यान्न की उपलब्धता वरन आम लोगों की क्रयशक्ति, ईंधन और पानी की उपलब्धता, साक्षरता का विस्तार और यहां तक कि महिला सशक्तीकरण को भी सम्मिलित करना चाहिए।

अब अचानक गंभीर चर्चाओं में इस प्रकार की इतर दलीलों की जगह नहीं रह गई है। खाद्य असुरक्षा और यहां तक कि अभाव, बड़े पैमाने पर भुखमरी और अकाल भी अब असंभव नहीं लगते। मुद्रास्फीति की दर ने 7.41 फीसदी का आंकड़ा छू लिया, जिसने सरकार को इस कड़वी सचाई से अवगत करा दिया कि ‘आम आदमी’ की अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता और विकास साथ-साथ नहीं चल सकते। संप्रग के वाम सहयोगियों के पास मुद्रास्फीति के इलाज के नाम पर महज स्टैंडर्ड सुझावों का एक सेट है।

- निर्यात पर प्रतिबंध, सस्ते आयात के लिए दरवाजे खोलना,

- घरेलू कमोडिटी मार्केट्स को हतोत्साहित करना और व्यापारियों के घरों व गोदामों पर छापे मारना और आखिरकार,

- श्रमजीवियों की आय में बढ़ोतरी करना।

पिछले दो हफ्तों से इन सब उपायों को अपनाया जा रहा है और मुद्रास्फीति की दर में कमी नहीं आई है। संप्रग सरकार औपचारिक तौर पर एक बार फिर खाद्यान्न बाजारों के राष्ट्रीयकरण के बारे में विचार कर रही है जैसी कोशिश इंदिरा गांधी ने एक बार की थी। लगता है सरकार समावेशी विकास की ‘आम आदमी’ अधोसंरचना ला रही है जो नेहरूवादी किसान-विरोधी नीतियों की ओर लौटने जैसा होगा, जिसमें शामिल है:-

1) सीएसीपी(कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस) द्वारा कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनुशंसा, जो वस्तुत: किसानों को मिलने वाला उच्चतम मूल्य होगा।

2) प्रतिबंधों की एक समूची श्रेणी जो बाजार की कीमतों को हतोत्साहित करेगी।

3) भारतीय खाद्य निगम(एफसीआई) जिसकी अक्षमता और बर्बादी का जबरदस्त रिकॉर्ड है, और

4) सार्वजनिक वितरण प्रणाली जिसमें 36 फीसदी से 50 फीसदी तक रिसाव है और जो गरीबी रेखा से नीचे या इससे ऊपर रहने वाले लोगों को थोड़ा-बहुत फायदा पहुंचाती है।

इन तौर-तरीकों से परिस्थितियां और बिगड़ेंगी। इसके लिए वास्तव में बिलकुल अलग तरह की अधोसंरचना की जरूरत है:-

1) वायदा बाजार से सभी तरह के प्रतिबंध हटा लेने चाहिए जिससे किसानों को यह संकेत जाएगा कि वे पैदावार पर अपनी फसल की कीमत पा सकते हैं,

2) गोदामों और लेन-देन करने लायक वेयरहाउसिंग रसीदों का एक सिस्टम जो पहले से ही लागू है,

3) कमोडिटी बाजार को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) और विदेशी संस्थागत निवेश(एफआईआई) के अंतप्र्रवाह के लिए खोलना, जिससे सेबी द्वारा इंडस्ट्रियल सेक्टर में किए गए चमत्कार को कृषि में भी क्रेडिट व निवेश की पर्याप्त आपूर्ति के लिए दोहराया जा सके।

दुर्भाग्य से सत्ता में बैठे राजनेता अदूरदर्शी हैं। वे ऐसी योजनाएं लाते हैं जिनका कार्यकाल पांच साल से कम हो और जो अक्सर असफल होती रही हैं। इसके बावजूद वे उन्हें बार-बार दोहराते हैं। इसके विपरीत ऐसी योजनाएं जिनका दूरगामी लाभ हो, उन्हें नहीं चुना जाता क्योंकि उनका फल आने वाली सरकार के खाते में जाएगा। इसीलिए इस बात की उम्मीद कम है कि संप्रग सरकार विपक्ष के खिलाफ बहस के मुद्दों में उलझने की बजाय मुद्रास्फीति की दर में आए मौजूदा उछाल को आमूलचूल बदलाव के अवसर के रूप में लेगी।

-लेखक राज्यसभा सदस्य और श्वेतकारी संगठन से जुड़े हुए हैं।





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