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चीनी का विकल्प होगा स्टीविया!

जयपुर. विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग ने टिश्यू कल्चर से तैयार किए 80 पौधे, चीनी से 300 गुना ज्यादा मीठा होता है यह पौधा, डायबिटीज के रोगियों पर साइड इफेक्ट नही, मूलतया दक्षिण अमेरिका में उगता है स्टीविया

चीनी से 300 गुना ज्यादा मिठास वाले स्टीविया पौधे की खेती किसानों के लिए फायदेमंद हो सकती है। मूलतया दक्षिण अमेरिका के पैराग्वे देश का यह पौधा भारत में आबोहवा अनुकूल होने से अच्छी तरह से विकसित होता है। राजस्थान विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर अमला बत्रा के निर्देशन में शोध कर रही अनिला अंदलीब ने टिश्यू कल्चर तकनीक से स्टीविया के एक डंठल से 80-90 पौधे विकसित किए हैं।

अनिला ने बताया कि टिश्यू कल्चर में इसे 7 से 10 दिन में विकसित कर एक महीने में पूरा पौधा तैयार हो जाता है। परंपरागत फसलों के मुकाबले इसमें अधिक आय होती है। इसे लगाने में 80 हजार रुपए प्रतिएकड़ तक का खर्च आता है। उसके बाद तीन साल तक इसे लगाने की जरूरत नहीं होती। एक साल में किसान इससे प्रतिएकड़ 17 से 25 क्विंटल उत्पादन कर दो लाख रुपए तक कमा सकता है। उन्होंने इस पौधे की पत्तियों से स्टीवियोसाइड तैयार किया है जो चीनी से कई गुना मीठा है।

अनिला ने बताया कि स्टीविया की एक ग्राम पत्तियों को पीसकर 100 ग्राम पानी में डालने से 10 से 20 ग्राम तक चीनी जितनी मिठास मिलती है। साथ ही एनर्जी, प्रोटीन, फैट, काबरेहाइड्रेट, फाइबर भी मिलते हैं। इसका लंबे समय तक उपयोग करने से बीटा सैल से इन्सुलिन बनाने में भी मदद मिलती है, जिससे डायबिटीज की रोकथाम होती है। ‘स्टीविया कुक बुक’ के सहायक लेखक डॉ.रे शाहीलियन के अनुसार यह स्वीटनर पैनक्रियाज (अग्नाशय) से इंसुलिन रिलीज करता है।

शोधार्थी के अनुसार, स्टीविया की मिठास में जीरो कैलोरी होती है, जिससे शरीर के किसी अंग पर विपरीत प्रभाव नहीं होता। इससे दांतों की बीमारी में भी फायदा होता है। डायबिटीज के रोगी चीनी के विकल्प के तौर पर शुगर-फ्री सैक्रीन का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन रसायनयुक्त होने से इसका ज्यादा उपयोग नुकसानदायक हो सकता है। इसके विपरीत स्टीविया का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। इसे सफेद पाउडर व गोलियों के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

स्टीविया डायबिटीज के रोगियों के लिए सिर्फ चीनी के विकल्प के तौर पर सामने आया है। इससे बीटासैल विकसित कर इंसुलिन बनाने के दावे तो हो रहे हैं, लेकिन इसका वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है।
—डॉ.अरविन्द गुप्ता, डायबिटीज विशेषज्ञ

स्टीविया की खेती से किसानों को निश्चित तौर पर फायदा देगा।
—डॉ.ओ.पी. गिल, कृषि वैज्ञानिक, बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय, दुर्गापुरा





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