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अपनी पदोन्नति का फैसला खुद न करें

जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि आरएएस पदोन्नति मामले में रिव्यू डीपीसी की बैठक में वह व्यक्ति सदस्य के रूप में भाग नहीं ले सकता, जिसका प्रकरण इस डीपीसी में लंबित हो। न्यायाधीश ज्ञान सुधा मिश्रा एवं आर.एस.चौहान की खंडपीठ ने यह आदेश तीन आरएएस अधिकारियों हनुमान सिंह भाटी, राजेश यादव एवं अजय सिंह चित्तौड़ा की अपील पर सुनवाई के बाद दिया।

अदालत ने अपने आदेश की प्रति अतिरिक्त महाधिवक्ता भरत व्यास को देते हुए बुधवार को फिर सुनवाई रखी है। इन तीनों अधिकारियों ने खंडपीठ में एकलपीठ के 10 अप्रैल 08 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सरकार से कहा गया था कि वह आरएएस की वरिष्ठता सूची तैयार कर पदोन्नति की प्रक्रिया शुरू करे। खंडपीठ के आदेश के बाद मंगलवार को डीपीसी की बैठक नहीं हो पाई।

अधिकारियों ने बताया कि राज्य सरकार ने राजस्थान लोक सेवा आयोग के चेयरमैन सी.आर.चौधरी की अध्यक्षता में विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) बनाई।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता वाई.सी.शर्मा ने दलील दी कि चौधरी का प्रकरण भी आरएएस की रिव्यू डीपीसी में शामिल है। आयोग के चेयरमैन व सदस्य बनने से पहले चौधरी खुद आरएएस अधिकारी थे और 2002 तक इस सेवा में थे। इसलिए वे रिव्यू डीपीसी का अध्यक्ष होने के नाते खुद की पदोन्नति का निर्णय खुद ही करेंगे।

भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति से पहले संशोधित वरिष्ठता सूची को उनकी अध्यक्षता में ही अंतिम रूप दिया जाएगा जो कि अवैधानिक है। वकील ने यह भी कहा कि यह आदेश एकलपीठ के 2001 के उस आदेश की अवहेलना है, जिसमें कहा गया था कि पदोन्नति का पहला आधार मेरिट, दूसरा वरिष्ठता और तीसरा आरक्षण हो।

वरिष्ठता के विवाद में फिर अटकी पदोन्नति
आईएएस में पदोन्नति के लिए आरएएस अधिकारियों की नए सिरे से वरिष्ठता तय करने के लिए होने वाली विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की कार्यवाही फिर अटक गई है। तीन आरएएस अधिकारी मंगलवार को कोर्ट से स्टे ले आए। यह सिलसिला करीब 15 साल से चल रहा है। जब-जब पदोन्नति की कवायद शुरू होती है, तो कोई न कोई अधिकारी कोर्ट में चला जाता है।

कार्मिक विभाग लगभग तीन महीने से आरएएस अधिकारियों की पदोन्नति की कार्यवाही में जुटा हुआ था। इसके लिए पात्र अधिकारियों की एसीआर मंगवाने के साथ ही नए सिरे से रिव्यू डीपीसी कराने की तैयारी की जा रही थी, पर मंगलवार को बैठक शुरू होने से पहले ही हाईकोर्ट का आदेश आ गया। अपने ही साथियों द्वारा स्टे लाने से आरएएस अफसरों में तो निराशा हुई ही है, आईएएस अफसर भी इसे अच्छा नहीं मान रहे हैं। इधर, हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर मिलने के बाद कार्मिक विभाग याचिका पर सरकार की ओर से जवाब फाइल कराने की तैयारियों में जुट गया है। कार्मिक सचिव संजय मल्होत्रा ने इस बारे में मुख्य सचिव डी.सी.सामंत से भी चर्चा की।

इन्होंने की आपत्ति :
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अजयसिंह चित्तौड़ा, राजेश यादव और हनुमानसिंह भाटी ने हाईकोर्ट में इस बात पर आपत्ति की है कि आरपीएससी के चेयरमैन सी.आर.चौधरी भी आरएएस अधिकारी रह चुके हैं। रिव्यू डीपीसी में वे अपनी वरीयता भी तय करेंगे, जो गलत है। इनसे पहले प्रमिला सुराणा, प्रभा टांक, मोतीलाल गुप्ता, हनुवंतसिंह भाटी, पी.पी.बिडियासर सहित कई लोग अदालत जा चुके हैं।

इसलिए तय नहीं हो पा रही वरिष्ठता :
कुछ आरएएस अधिकारियों ने जोड़-तोड़ बिठाकर वर्ष 1991-92 में पदोन्नति ले ली थी। इसमें सरकार खाली पदों से ज्यादा लोगों को वरिष्ठ से चयनित वेतन श्रंखला में पदोन्नति दे दी थी। अब हाईकोर्ट के आदेश के तहत रिव्यू डीपीसी बैठक होती है तो कुछ अधिकारियों के वरिष्ठता सूची में नीचे आने की संभावना है। इसलिए ये अधिकारी अपनी वरिष्ठता बरकरार रखे जाने के प्रयास कर रहे हैं।

चौदह साल पहले हुए थे प्रमोशन :
आरएएस से आईएएस में अंतिम बार प्रमोशन 1994-95 में हुए थे। इसके बाद 1995-96 में कोई वैकेंसी ही नहीं थी। उसके बाद से वरीयता सूची तय करके प्रमोशन दिए जाने हैं।

आरएएस कोटे के 53 पद खाली हैं :
आईएएस में आरएएस कोटे के 53 पद खाली हैं। करीब तीन गुना अधिकारी जोन ऑफ कन्सीडरेशन में आते हैं। इसके लिए 1982-83 बैच तक के अधिकारियों की एसीआर मांगी गई हैं। इसके लिए कार्मिक विभाग को रिव्यू डीपीसी करके 1986-87 की सीनियर से सलेक्शन और 1992-93 की सलेक्शन से सुपर टाइम की अंतिम वरीयता सूची जारी करनी होगी।

राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी एसोसिएशन के अध्यक्ष पी.पी.बिडियासर का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश के तहत सरकार तो आरएएस से आईएएस में प्रमोशन करना चाहती है, लेकिन हमारे ही कुछ अधिकारी कोर्ट में जाकर स्टे ले आते हैं।





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