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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर.
सेल फोन यूजर्स के वीर्य(सीमन) में शुक्राणु(स्पर्म) की संख्या तेजी से कम हो रही है, शोध में यह खुलासा होने के बाद शोधकर्ता इसके बचाव के उपाय खोजने में जुट गए हैं। सेल फोन रखने के लिए किस तरह के कवच(कवर) की आवश्यकता है जिससे सेल फोन से निकलने वाली हानिकारक किरणों को रोका जा सके, इस पर शोध के लिए जीवाजी विश्वविद्यालय की इलेक्ट्रोनिक्स अध्ययनशाला की एक परियोजना को मप्र काउंसिल ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी ने स्वीकृत किया है।
वहीं सेल फोन यूजर्स महिला एवं पुरुषों की प्रजनन क्रिया पर क्या-क्या प्रभाव पड़ते हैं, इसका पता लगाने के लिए जीवाजी विश्वविद्यालय की इलेक्ट्रोनिक्स अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष प्रो. डीसी तिवारी तथा बायोकेमिस्ट्री अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष प्रो. वायके जायसवाल ने प्रयास शुरू कर दिए हैं।
डॉ तिवारी व डॉ जायसवाल का कहना है कि सेल फोन में इस्तेमाल होने वाली कौन-सी माइक्रोवेव प्रजनन क्रिया के लिए हानिकारक हैं, इसके विस्तृत शोध की जरूरत है। इसके चलते उन्होंने संयुक्त रूप से शोध परियोजना तैयार की है जिसे इण्डियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर), नई दिल्ली को भेजा जा रहा है। इसके तहत माइक्रोवेव की फ्रिक्वेंसी पर इलेक्ट्रोनिक्स विभाग व फ्रिक्वेंसी का मेल व फीमेल पर प्रभाव जांचने के लिए बायोकेमिस्ट्री विभाग में शोध किया जाएगा। यह शोध सफेद चूहों पर होगा।
अमेरिका में किया शोध
भारतीय मूल के डॉ. अशोक अग्रवाल, जो वर्तमान में क्लीवलैंड क्लीनिक फाउण्डेशन ओहायो, अमेरिका के निदेशक हैं, ने इफेक्ट ऑफ सेल फोन यूजेस ऑन सीमन एनालिसिस इन मेन अटेंडिंग इनफर्टिलिटी: एन ऑबजरवेटिंग स्टडी पर शोध किया था।
321 युवाओं पर शोध
डॉ. अग्रवाल ने औसत आयु 31 साल के युवाओं के सीमन पर सितम्बर 2004 से अक्टूबर 2005 तक शोध कार्य किया। शोध के लिए चुने गए युवाओं में एक दिन में औसतन दो घंटा(लगातार एक साल तक) सेल फोन का उपयोग करने वाले 107, दो से चार घंटा तक उपयोग करने वाले 100 तथा चार से अधिक घंटे तक सेल फोन का उपयोग करने वाले 114 युवा थे। सभी युवा सामान्य थे अर्थात् वे किसी बीमारी से ग्रसित नहीं थे। डॉ. अग्रवाल ने युवाओं के सीमन की विस्कोसिटी, पीएच, स्पर्म काउंट, मोटीलिटी व मॉफरेलॉजी जांच की।
..तो इंपोटेंट होगा मनुष्य
डॉ. तिवारी व डॉ. जायसवाल ने बताया कि स्वस्थ मनुष्य के सीमन में एक मिलीमीटर में स्पर्म की संख्या 96 लाख होती है। शोध से स्पष्ट है कि यदि इसके सुरक्षित उपाय नहीं खोजे गए तो आने वाले समय में मोबाइल यूजर मनुष्य इंपोटेंट हो जाएगा। चूंकि स्पर्म की माफरेलॉजी भी तेजी से परिवर्तित हो रही है, इसलिए असामान्य (एबनॉर्मल) संतान उत्पन्न होने का खतरा भी बढ़ जाएगा।