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अब है क्रीमीलेयर का संघर्ष

दृष्टिकोण. एक राष्ट्र के तौर पर हमारी यह भी एक बड़ी उपलब्धि है कि हम व्यापक पैमाने पर सामाजिक भेदभाव का विरोध करते हैं। 11 अप्रैल को एक बार फिर यही बात नजर आई, जब सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के लिए 27 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी। हालांकि मैं किसी भी तरह के आरक्षण के खिलाफ हूं, लेकिन मैं पिछड़ी जातियों के लिहाज से इस सकारात्मक कदम का समर्थन करता हूं।

मेरे इस समर्थन की मुख्य वजह यह है कि देश में आगे चलकर ओबीसी और दलित ही राज करेंगे और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि पिछड़ी जातियों की आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वजों की अपेक्षा बेहतर शिक्षित और शासन के लिहाज से कहीं अधिक सक्षम हो। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो शासन-व्यवस्था सुधरने वाली नहीं है।

यदि ऐसा है तो जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया, तो मेरे पेट में दर्द क्यों उठा? ऐसा इसलिए क्योंकि इस कोर्ट केस का सामाजिक न्याय से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा, न ही इसका आम ओबीसी की वैध आकांक्षाओं से वास्ता था। यह तो दो ‘क्रीमीलेयर्स’- पिछड़ी और उच्च जातियों के मध्यवर्ग के बीच की लड़ाई थी, जिसमें संभवत: देश पराजित हुआ है। मुझे डर है कि यह ‘ऐतिहासिक’ निर्णय हमारे चुनिंदा अच्छे संस्थानों को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है। जस्टिस भंडारी द्वारा इस निर्णय के संदर्भ में की गई टिप्पणियों में भी मेरे संताप की कुछ झलक मिलती है।

गांव में एक साधारण ओबीसी परिवार अपने बच्चों के लिए कोई अच्छा प्राथमिक स्कूल चाहता है ताकि वह गरीबी से ऊपर उठ सके। उसे आईआईटी या आईआईएम जैसे संस्थानों में प्रवेश की लालसा नहीं होती। ओबीसी आरक्षण राजनीतिक वर्ग का गुप्त एजेंडा था, जिसका मकसद खुद अपने बच्चों को इसके सहारे इन बेहतरीन संस्थानों में घुसेड़ना था।

दुर्भाग्य से उनकी यह चाल उलटी पड़ी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘क्रीमीलेयर’ को इस 27 फीसदी कोटे का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में भले ही ओबीसी का राजनीतिक वर्ग बाहरी दुनिया के सामने दिखावटी तौर पर इस निर्णय का स्वागत कर रहा हो, लेकिन अंदर ही अंदर उसमें निराशा व्याप्त है। ओबीसी मतदाताओं और राजनेताओं की आकांक्षाएं अलग-अलग हैं और कोटा विवाद विशुद्ध ताकत की लड़ाई थी तथा सामाजिक न्याय की बहस भी नकली थी।

वास्तव में ऐसे भारत का हमारा सपना है जहां हर कोई मध्य वर्ग से आता हो। अब हमें पता है कि आर्थिक विकास की तेज रफ्तार के जरिए ऐसा हो सकता है। हम यह भी जानते हैं कि व्यक्तिगत प्रतिभाओं का उच्च विकास में अतुलनीय योगदान है। चूंकि किसी समाज में प्रतिभा संसाधन आसानी से नहीं मिलते, ऐसे में सफल देश इसे आईआईटी जैसे सर्वोत्कृष्ट संस्थानों के जरिए पोषित-प्रशिक्षित करते हैं।

वे आईआईटी-जेईई की परीक्षा में पचासवीं रैंक पाए किसी शख्स को पचास हजारवीं रैंक वाले व्यक्ति के साथ एक ही क्लासरूम में नहीं बिठाते। इसके साथ-साथ वे बाकी समाज की मांगों को भी ठीक-ठाक संस्थानों की समुचित आपूर्ति के जरिए पूरा करते हैं। इस तरीके से वे उत्कृष्टता और समानता दोनों को साध लेते हैं।

देश में बेहतरीन शिक्षण संस्थाओं की कमी के चलते उच्च शिक्षा में आरक्षण की मांग उठी। यह कमी इसलिए है, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र को इंडस्ट्री की तरह उदार नहीं बनाया गया। इस पर नेताओं और बाबुओं का नियंत्रण है, जो चुन-चुनकर खैरात बांटते हैं। आपको कोई स्कूल या कॉलेज खोलने के लिए दर्जनों लोगों की मुट्ठियां गर्म करनी पड़ेंगी। ऐसा माहौल नए बेहतरीन संस्थानों को आने से रोकता है।

इसके अलावा सरकार अपने ही विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता नहीं देती। इसके चलते हमारे 300 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में से चालीस से भी कम विश्वविद्यालयों से रोजगार के लायक स्नातक निकलते हैं। यदि इन्हें एआईसीटीई/यूजीसी राज से मुक्ति मिल जाए, तो कई सरकारी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों का शैक्षणिक स्तर कई गुना सुधर सकता है।

एजुकेशन सेक्टर के बिलकुल उलट भारतीय अर्थव्यवस्था 1991 से दिन पर दिन उदार होती जा रही है। ज्यादा से ज्यादा ग्राहक पाने की होड़ में निजी कंपनियां आपूर्ति का दायरा बहुत तेजी से फैला रही हैं। मार्च में, तकरीबन बीस करोड़ घरों वाले इस देश में मोबाइल कंपनियों के ग्राहकों की संख्या तीस करोड़ तक पहुंच गई। अब कोई भी टेलीफोन में कोटा या आरक्षण की बात नहीं करता क्योंकि इसके बाजार ने आपूर्ति और गुणवत्ता दोनों में सुधार किया है। ऐसा ही शिक्षा-व्यवस्था में भी संभव है, यदि इसे उदार बना दिया जाए।

हमारा राजनीतिक वर्ग शिक्षा के उदारीकरण के सख्त खिलाफ है, क्योंकि तब इसका अभाव नहीं रहेगा। तब कोटा और आरक्षण की कोई जरूरत नहीं होगी। तब राजनेता अपना वोट बैंक कैसे बनाएंगे? विश्व के आंकड़े बताते हैं कि अजरुन सिंह दुनिया की निकृष्ट प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में से एक के मुखिया हैं, जो कई अफ्रीकी देशों से भी बदहाल है। उनका काम इस सड़ी-गली व्यवस्था में सुधार लाना था। इसकी बजाय उन्होंने जाति-संघर्ष को हवा दी और देश का ध्यान असल जरूरतों से हटाकर इस ओर कर दिया। मतदाता मूर्ख नहीं हैं और उनके इस खेल को समझते हैं। ऐसे में यदि अजरुन सिंह को लगता है कि उनकी इस चाल से कांग्रेस के वोट बढ़ जाएंगे तो वे गलती कर रहे हैं।

यह सब कहने के बाद, हमें साफ-सुथरे और समतामूलक समाज के निर्माण के महत्व को नहीं भूलना चाहिए। सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों के प्रति सकारात्मक कदम उठाना राष्ट्र के लिहाज से बहुत जरूरी है। सकारात्मक कदम उठाने का मतलब अतीत की गलतियों को सुधारना नहीं है। सकारात्मक कदम के लिहाज से बेहतरीन दलील यही है कि हमारा देश विविधताओं से भरा है। यदि हमारे कला, वाणिज्य, विज्ञान और पेशेवर जगत के नेता महज 15 फीसदी के छोटे से हिस्से से आएंगे, तो हम अपनी विविध संपदाओं का लाभ नहीं उठा सकते।

भला हो लोकतंत्र का जिसके चलते हमारे यहां पिछड़ी जातियों के कई नेता हैं, लेकिन वे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं और अक्सर अपने ही लोगों के हितों के खिलाफ काम करते हैं। सकारात्मक कार्रवाई यह सुनिश्चित करेगी कि ओबीसी की अगली पीढ़ी ज्यादा शिक्षित होगी और हम ऐसे ओबीसी नेता निर्मित करेंगे, जो देश के लिए रोल मॉडल होंगे। यदि हम ऐसा करने में सफल रहे तो न सिर्फ यह ओबीसी की, वरन पूरे देश की जीत होगी।

-लेखक ‘मुक्त भारत’ के रचयिता हैं।





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