संपादकीय. अपनी नीतियों या बाहरी कारणोंवश जब-तब सहयोगी दलों द्वारा समर्थन वापसी की धमकी झेलना कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की नियति सी हो गई है। आर्थिक सुधार, विदेश नीति, परमाणु करार जैसे मुद्दों पर सरकार ऐसी धमकियां झेल चुकी है। अब महंगाई के मुद्दे पर तो वामदल और यूएनपीए ने सड़क पर उतरकर सरकार के खिलाफ पूरी मोर्चाबंदी कर ली है।
पर लगता है कि यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शायद इसके आदी हो गए हैं। यही वजह है कि उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की सबसे ताजी धमकी पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मायावती ने ऐसी ही धमकी कुछ महीनों पहले भी दी थी, जब उन्होंने केंद्र से उत्तरप्रदेश के लिए 80,000 करोड़ रुपए के आर्थिक विकास पैकेज की मांग की थी।
फिर वे इस मुद्दे पर चुप हो गईं और शायद उत्तरप्रदेश के प्रशासन, बसपा के समारोहों और उपचुनाव की तैयारियों में व्यस्त हो गईं। अब जब उपचुनावों में बसपा को जीत हासिल हुई है तो उन्होंने पाया कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी रात-दिन एक कर दलित परिवारों में भारत का दर्शन कर रहे हैं। शायद राहुल गांधी की यह यात्रा मायावती को कुछ खास पसंद नहीं आई, इसलिए अब उन्होंने केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने की नई चेतावनी दे डाली है।
साफ है कि राहुल गांधी की यूपी यात्रा से मायावती को वह मौका मिल गया है जिसके जरिये वे कांग्रेस पर अपने हमले और तेज कर सकें। मायावती ने यह भी कहा है कि कांग्रेस के ‘युवराज’ राजनीति नहीं समझते, क्योंकि उन्हें राजनीतिक ताकत विरासत में मिली है। मायावती भी अपनी राजनीतिक मजबूती के लिए कांशीराम को सारा श्रेय देती हैं और अपने द्वारा किए गए तमाम कामों के लिए कांशीराम की वसीयत का हवाला देती हैं।
हमारे देश में जहां राजनीति और राजनीतिक गठजोड़ ही सरकार के हर कदम को निर्धारित करते हैं, वहां मायावती को यह उम्मीद नहीं होनी चाहिए कि कांग्रेस या अन्य पार्टी ऐसा नहीं करेंगे। महंगाई को भी किसी दल ने राजनीतिक मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यूपी में सरकार की नीतियों पर कोई कुछ भी कहे, फिर भी उपचुनाव में बसपा की जीत यह तो अहसास दिलाती ही है कि वहां की जनता का एक बड़ा वर्ग उनसे सहमत है। कांग्रेस को मायावती के लिए अब कोई नया जवाब सोचने की जरूरत है।