पृथ्वी दिवस पर विशेष. आज की चमक-दमक और तकनीकी विकास के हैरतअंगेज दौर में लोग यह भूल ही गए हैं कि यह सब मेरे कारण ही हुआ है। मेरे ही प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का परिणाम है कि आज आदमी का जीवन कहीं अधिक सुविधाजनक और विलासपूर्ण हो गया है। यह और बात है कि अपना जीवन स्तर ऊंचा उठाने और जीवन में सदा आगे बढ़ते रहने के चक्कर में मनुष्य ने मेरा सीना छलनी कर दिया है।
पहले राजा-महाराजाओं ने किले-महल बनाने में ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, संगमरमर आदि मेरे गर्भ से खोद डाले। महारानियों और नर्तकियों को आभूषणों से लादने के लिए बहुमूल्य खनिज निकाले। फिर मशीन आ जाने पर मेरे गर्भ से कोयले और पेट्रोल का उत्खनन किया। अब पानी की तलाश में जगह-जगह अवैज्ञानिक ढंग से मेरी छाती में भेदन कर हैंडपंप और नलकूप बना डाले।
आज हालत यह आ पहुंची है कि सोने की सबसे प्रमुख खदान कोलार में सोना और ताजमहल में लगा संगमरमर अब मकराना में लगभग खत्म है। गंगा-यमुना के मैदानी भागों को छोड़कर भूजल पूरे देश में इतनी गहराइयों में समा गया है कि पानी की त्राहि-त्राहि मची है। दरअसल, विकास की इस चूहादौड़ में मानव यह भूल ही गया है कि वह पृथ्वी का विकास कर रहा है या विनाश।
मनुष्य को मेरे जन्म, मेरी आंतरिक संरचना और मेरी यात्राओं का तनिक भी भान नहीं है, इसलिए वह मेरे साथ अंधाधुंध छेड़छाड़ करता रहता है। वह तो भला हो गेराल्ड नेलसन का, जिनके सुझाव पर 22 अप्रैल को पूरे विश्व में मेरा दिवस (पृथ्वी दिवस) मनाने की परंपरा तो शुरू हुई। इस अवसर पर मैं बताना चाहूंगी कि आज से लगभग पांच अरब वर्ष पहले मेरा जन्म हुआ था और आदिम मानव संभवत: पांच लाख वर्ष पूर्व हिमानी जलवायु के आरंभिक काल में अवतरित हुआ।
समाज शास्त्रियों के मुताबिक आधुनिक मानव का पदार्पण लगभग पांच हजार वर्ष पहले हुआ था। अत: यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि मेरी इस अनंत यात्रा की तुलना में मनुष्य का जीवनकाल लगभग नगण्य है। लेकिन इस अल्पकाल में ही मानव ने अपना जीवनस्तर सुधारने और विलासितापूर्ण जीवनशैली अपनाने के चक्कर में मुझे किस कदर लहूलुहान और बेरौनक कर दिया है। हां, इसके दुष्परिणाम उसे भुगतने पड़ रहे हैं।
वर्षा में कमी आई है, तापमान बढ़ा है, हिमनद पिघल रहे हैं, वातावरण में जलवायु परिवर्तन कहर ढाने लगा है। इसलिए कुछ समझदार लोगों ने रियो डि जेनेरियो(ब्राजील) में पहला ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया, ताकि मेरी बर्बादी बंद हो और मानव के लालच पर अंकुश लगे।
भूवैज्ञानिकों के अनुसार मैं प्रारंभ में एक अविभाजित ठोस पिंड थी, जिसका नाम था ‘पेंजिया’, जिसके चारों ओर एक आदि महासागर ‘पैथालासा’ फैला हुआ था। कालांतर में आंतरिक गतिविधियों के फलस्वरूप मैं उत्तर व दक्षिण के दो भागों क्रमश: ‘लारेशिया’ और ‘गौंडवानालैंड’ में विभक्त हो गई तथा जिसके मध्य एक ‘टेथिस’ नामक महासागर भी अवतरित हो गया।
इसी महासागर में करोड़ों वर्षो के अवसादन के फलस्वरूप विशाल हिमालय पर्वत श्रंखला का जन्म हुआ। धीरे-धीरे मेरे और भी टुकड़े होते गए और वे एक-दूसरे से दूर विस्थापित होते चले गए, जिनके नाम आज यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटाकर्टिक हैं। इसी प्रकार महासागरों का विभाजन और विस्थापन हुआ।
मानव को मेरे गर्भ यानी आंतरिक रचना के बारे में भी कम जानकारी है। यह और बात है कि अपने लाभ के लिए वह बेशकीमती धातुएं, हीरे-जवाहरात, शैल, कोयला, पेट्रोलियम, भूजल आदि मेरी ही कोख से प्राप्त करता है। मनुष्य यह भी आकलन नहीं कर रहा है कि बेशकीमती रत्न, बहुमूल्य धातुएं और मजबूत शैल समेत कोयला और पेट्रोलियम पदार्थो के निर्माण में करोड़ों वर्ष लगे हैं और मनुष्य है कि इन बहुमूल्य खनिजों और शैलों का ताबड़तोड़ इस्तेमाल कर उन्हें पूरी तरह नष्ट करने पर आमादा है।
अपने इस उन्माद में मनुष्य यह भूल ही गया कि शैल एवं खनिजों की पुनप्र्राप्ति संभव नहीं है। शैल व खनिज उसे विरासत में मिले हैं। उनकी हिफाजत और सुरक्षा मनुष्य का नैतिक दायित्व है। पर फिक्र किसे है? आज घर-घर की फर्श पर संगमरमर बिछाया जा रहा है, यही बात ग्रेनाइट की है। कोयले और पेट्रोल की खपत इस रफ्तार से बढ़ी है कि मनुष्य को यह होश ही नहीं कि किसी दिन तेल व कोयले के भंडार समाप्त हो गए, तब क्या होगा?
मेरे सम्मान में मनाए जा रहे ‘पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर मेरी मानव से यही अपील है कि शैलों और खनिजों का अंधाधुंध दोहन व शोषण बंद हो। जितनी आवश्यकता है उतनी ही मात्रा में मेरे पदार्थो का उपयोग हो, तभी मेरा भविष्य सुरक्षित रहेगा। मुझे प्रसन्नता है कि कुछ लोगों ने अब ‘टिकाऊ विकास’ का नारा दिया है। उम्मीद है कि मेरे अगले जन्मदिन तक कुछ और पृथ्वी और प्रकृतिप्रेमी सक्रिय हो जाएंगे। आमीन।