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क्यों नहीं रुकती सड़क दुर्घटनाएं!

दृष्टिकोण. मध्य गुजरात में बोडेली के समीप 16 अप्रैल को गुजरात राज्य परिवहन की बस में परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थियों के लिए वाघबोड़ से बोडेली का सफर जीवन का अंतिम सफर साबित हुआ। 41 विद्यार्थियों सहित बस का ड्राइवर-कंडक्टर व एक वृद्धा सहित 44 लोग नर्मदा की गोद में समा गए। यह दुर्घटना ड्राइवर की लापरवाही के कारण हुई या यांत्रिक खराबी के कारण, यह प्रश्न तो हमेशा की तरह एकाध माह में खत्म हो जाएगा, परंतु मूल प्रश्न यह है कि राज्य परिवहन की बसों से होने वाली इस तरह की गंभीर दुर्घटनाओं पर अंकुश लग पाएगा या इनमें कमी लाई जा सकती है।

ऑटो मोबाइल क्रांति के बाद विश्व में सबसे पहला सड़क हादसा 1896 में इंग्लैंड में हुआ था। उस समय भी समाचार माध्यमों ने जमकर हो-हल्ला मचाया था। लंदन के तत्कालीन महापौर ने लोगों को उस समय विश्वास दिलाया था कि शहर में ऐसा हादसा फिर कभी न हो, इसके लिए हम सड़क सुरक्षा के प्रति खास सतर्कता बरतेंगे। इस सड़क दुर्घटना के 112 वर्ष बाद विश्वभर में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

सड़क पर बढ़ते यातायात के दबाव के चलते प्रतिवर्ष 25 लाख लोग सड़क दुर्घटना में जान गंवा बैठते हैं, जबकि लगभग पांच करोड़ लोग घायल हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में 2020 तक विकासशील देशों में सड़क हादसों की संख्या 60 फीसदी बढ़ने की आशंका जताते हुए सड़क सुरक्षा को ही समय की मांग बताया है। मतलब सुरक्षित यातायात प्रबंधन के अलावा इस समस्या से निपटने का कोई बेहतर तरीका नहीं है।

नेशनल ट्रैफिक प्लानिंग एंड रिसर्च सेंटर की हालिया रिपोर्ट में सड़क दुर्घटनाओं में दुनिया में भारत पहले नंबर पर है, जबकि चीन छठे स्थान पर। आंकड़ों की दृष्टि से भारत में सड़क हादसों में अधिक मौतें हुईं, जबकि प्रतिशत के हिसाब से इथोपिया हमसे आगे है। प्रतिदिन के हिसाब से देखें, तो भारत में रोजाना 365 सड़क दुर्घटनाओं में 217 लोग मारे जाते हैं।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार भारत में एक वर्ष में प्रति हजार वाहनों में से 65 दुर्घटनाग्रस्त होते हैं। अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत में तिगुने सड़क हादसे होते हैं। अमेरिका एवं जापान जैसे सुविकसित देशों में यह आंकड़ा चार से भी कम है। विश्व में हर वर्ष होने वाली 20 लाख से अधिक दर्दनाक दुर्घटनाओं में से 70 फीसदी भारत जैसे विकासशील देशों में होती है। भारत में दुर्घटनाओं की संख्या में गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु सबसे आगे हैं।

1960 से 2006 की अवधि में देश में वाहनों की संख्या में 45 गुना इजाफा हुआ है परंतु इस अनुपात में सड़क नेटवर्क चार गुना भी नहीं बढ़ा है। अंधाधुंध शहरीकरण के कारण राज्य परिवहन निगमों की बसों पर यात्रियों का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसके चलते होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में रोडवेज की बसों से होने वाले हादसों का योगदान 20 प्रतिशत होता है।

खास बात यह है कि इन सभी राज्यों के आर्थिक तथा विकास की दृष्टि से सक्षम व प्रगतिशील होने के बावजूद रोडवेज बसें खस्ताहाल हैं। पिछले दस वर्षो में यात्रियों की संख्या बढ़ी है, परंतु बसों की संख्या घटी है। गुजरात सरीखे राज्य की राज्य पथ परिवहन सेवा निगम के पास वर्ष 1995 में 14000 बसें थीं, जो 1998 में घटकर सिर्फ नौ हजार रह गईं। इनमें से भी करीब 7500 बसें खस्ताहाल स्थिति में थीं। समय सीमा पूरी होने के बावजूद ये खस्ताहाल बसें वर्षो तक सड़कों पर चलाई जाती हैं।

इन बसों का कोई वार्षिक फिटनेस टेस्ट नहीं कराया जाता। बीते एक दशक में रोडवेज में ट्रैफिक सुपरवाइजर, मैंटेनेंस इंजीनियर्स की भर्ती बंद है। मोटर व्हीकल एक्ट की मार्गदर्शिका का पालन राज्य तथा आरटीओ द्वारा नहीं किया जाता है। आखिर क्यों? सरकारी सूत्रों की मानें, तो गुजरात सहित सभी राज्य डीजल के भाव बढ़ने के बाद भी यात्री किराया नहीं बढ़ाते हैं।

प्रजातंत्र का यह भी एक अजीब खेल है कि सरकार लोकप्रिय होने के चक्कर में यात्री किराया नहीं बढ़ाना ही मुनासिब मानती है। इसके पीछे दलील दी जाती है कि 23 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे के होने के कारण सरकारी बसों का किराया नहीं बढ़ाया जा सकता। परिणामस्वरूप रोडवेज लगातार घाटे में चल रही हैं। रोडवेज की बसें शहरों की तुलना में गांवों में अधिक चलती हैं।

शहरों में निजी बस मालिक अवैध रूप से धंधा कर रहे हैं, जिससे सरकार को नुकसान हो रहा है, परंतु राजनेताओं की जेबें गर्म हो रही हैं। निजी वाहनों के कारण रोडवेज की आय के साथ यातायात का दबाव कम हो रहा है। इसलिए अधिकारी व नेता चुपचाप हैं। अपनी गद्दी बचाने के लिए ये लोग आम जनता की सुरक्षा के बारे में कोई विचार नहीं करते। दुर्घटनाओं के लिए केवल खराब-खटारा बसें ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि चालकों की लापरवाही, संसाधनों की कमी तथा यातायात प्रबंधन भी जिम्मेदार है।

भारत जैसे देश में ड्राइवरों के लिए विधिवत प्रशिक्षण की कोई सुचारु व्यवस्था नहीं है। बिना किसी खास जांच के चालकों को 10 से 20 साल के लिए हैवी मोटर व्हीकल लाइसेंस मिल जाता है। पश्चिम के देशों की तरह ड्राइवरों का प्रति वर्ष फिजिकल फिटनेस टेस्ट नहीं लिया जाता है। कहीं ड्राइवर ब्लड प्रेशर, मधुमेह से लेकर दृष्टि दोष जैसी आधुनिक बीमारियों से घिरा हुआ तो नहीं इस बात की जानकारी लेना तो दूर रहा, यह सतर्कता तक नहीं रखी जाती कि उसे दृष्टिदोष तो नहीं है।

ड्राइवर पूर्ण रूप से प्रशिक्षित नहीं होते। लंबे समय तक वाहन चलाने के कारण होने वाली थकानवश वाहन से नियंत्रण खो बैठते हैं। ड्राइवरों में नशीले पदार्थो के सेवन की लत भी पाई जाती है। बसों में ओवरलोडिंग, जल्दबाजी में ओवरटेकिंग से बचने, रिवर्स लेते समय लापरवाही से लेकर हॉर्न, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र का प्रशिक्षण जैसे किसी भी उपाय का राज्य परिवहन को ख्याल तक नहीं है। सड़क पर बसों को कई वाहनों के साथ तालमेल बिठाते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचना पड़ता है। कभी मानव सर्जित तो कभी यांत्रिक खराबी के कारण, मैकेनिकल तंत्र बिगड़ता है तो निदरेषों की जान जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का निष्कर्ष सही है कि प्रतिवर्ष सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या 15 फीसदी की दर से बढ़ रही है। यह देखते हुए इन पर नियंत्रण करने के लिए सड़क सुरक्षा के सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं है। ईरान, अलसल्वाडोर जैसे देश सड़क दुर्घटनाओं के मामले में भारत से भी खराब स्थिति में थे। जब इन देशों ने इसमें सुधार कर लिया है, तो भारत क्यों नहीं कर सकता। आबादी के मामले में हमसे आगे चीन भी सड़क दुर्घटनाओं के मामले में हमसे काफी पीछे है तो हम क्यों नहीं सुधार कर सकते हैं?





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