पानीपत.
पूरी पृथ्वी इस समय तापमान बढ़ने के कारण बुरी तरह से झुलस रही है। इससे मानव और पृथ्वी दोनों के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न् लग गया है। यही हालात रहे तो बहुत जल्दी ही पृथ्वी का 75 प्रतिशत हिस्सा जलमग्न हो जाएगा।
लोगों के सामने भोजन और पानी का संकट उत्पन्न हो जाएगा। बढ़ती जनसंख्या के कारण जहां खाद्यान्न की कमी हो रही है, वहीं औद्योगिकरण के कारण पीने योग्य पानी दूषित और इस्तेमाल होता जा रहा है।
ग्रीन हाउस गैसों के अधिक उत्सृजन के कारण जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहे हैं। हालांकि विश्व के 160 देश ग्रीन हाउस गैसांे पर लगाम लगाने के लिए संगठित हुए हैं। प्रस्तुत है अजय गर्ग की रिपोर्ट
समुद्री जलस्तर का जलजलाआस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं के अनुसार 1870 से 2004 के बीच समुद्री जलस्तर में 19.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले 50 वर्षो में यह गति काफी ज्यादा थी। संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2100 तक समुद्र का जलस्तर 28 से 43 सेंटीमीटर तक बढ़ जाएगा। इन्हीं परिवर्तनों के कारण पिछले 130 वर्षो के दौरान समुद्र मंे ज्वारों की संख्या और स्थान दोनों बदले हैं। यदि तापमान ऐसे ही बढ़ा तो समुद्री तटों पर स्थित विश्व की 75 प्रतिशत आबादी खत्म हो जाएगी।
खाद्यान्न और पानी पर संकटइन परिस्थितियों का खाद्यान्न और पेयजल पर भी निश्चित ही असर पड़ेगा। आईसीएआर ने तो गेहूं पर होने वाले असर पर शोध शुरू कर दिया है। गेहूं का उत्पादन भी विश्व में 585 मिलियन टन रहा है, जोकि बहुत अच्छा नहीं है। विश्व इससे अधिक उत्पादन कर सकता है, लेकिन ग्लोबल वार्मिग आड़े आ रही है। वहीं पेयजल भी बर्बाद हो रहा है। पृथ्वी का 70 प्रतिशत क्षेत्र पानी है। इसमें से 2.5 प्रतिशत ही पीने योग्य है।
इसमें से भी अधिकतर बर्फ मंे कैद है और केवल 0.26 प्रतिशत ही हमारी पहुंच में है। यह भी औद्योगिकरण के कारण खराब हो रहा है।
क्योटो संधि से आस
ग्रीन हाउस गैसों को रोकने के लिए 1997 मंे क्योटो संधि हुई और इसे 2002 में जर्मनी में अंतिम रूप दिया गया। अभी हाल ही में 160 देशों ने क्योटो संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत हर देश अपने यहां कार्बनडाई आक्साइड का स्तर 2012 तक पांच प्रतिशत के नीचे पहुंचाने के लिए प्रयासरत होगा। अभी भी अमेरिकी दादागिरी के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में दिक्कत आ रही है। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के समर्थन के बावजूद अमेरिका इसे नहीं मान रहा।
विनाश करने में कोई भी पीछे नहींग्रीन हाउस गैसों को बढ़ावा देने में कोई भी देश पीछे नहीं है। हालांकि विकसित देश ज्यादा मात्रा में गैसें ज्यादा छोड़ रहे हैं। 1900 से 1999 तक अमेरिका सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस को नुकसान पहुंचाने वाला देश रहा।
लगातार बढ़ता तापमान
19वीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर से औद्योगिकरण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इन 200 वर्षो में पृथ्वी का तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट आफ स्पेस स्टीडज के अनुसार अब पृथ्वी का औसत तापमान 14.5 डिग्री हो गया है।
अगले 100 वर्षो में तापमान के 3 डिग्री तक और बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है, जोकि एक खतरनाक स्थिति है। इससे बर्फ के पिघने की गति में बेतहाशा वृद्धि होगी। कार्बनडाई आक्साइड के लगातार बढ़ने से ही यह नौबत आ रही है।
पिघलती बर्फ से खतरा
ब्रिटेन के वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले 50 वर्षो में अंटार्कटिका प्रायद्वीप की 13000 वर्ग किलोमीटर बर्फ पिघल गई है। पश्चिमी अंटार्कटिका में गर्मी बढ़ने के कारण समुद्र के नीचे की बर्फ पिघल रही है। वहीं गर्मी की वजह से अधिक वाष्पीकरण के कारण पूर्वी अंटार्कटिका में 1992 और 2003 के बीच 1.8 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की मोटाई बढ़ रही है। यह क्षेत्र कुल हिम क्षेत्र का 85 प्रतिशत है। इससे आने वाले दिनों में तापमान और ज्यादा बढ़ने पर समुद्र का जलस्तर भी उसी अनुपात में बढ़ेगा।
क्यों हैं आंखें बंद?
हरियाणा में औद्योगिक विकास तो बहुत हुआ, लेकिन उसके साथ-साथ ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ाने वाले कारकों में भी काफी वृद्धि हुई, जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
जनसंख्या
1991 (लाख) 2001
164.64 211.45
फैक्ट्रियां
वर्ष 1966 2007
1168 10000 से ज्यादा
वाहन
वर्ष 1966 वर्ष 2007
2564 लगभग तीन लाख
वन क्षेत्र भी राज्य में केवल 3.47 प्रतिशत ही है, जबकि यहां जलस्तर 3 से 5 मीटर तक नीचे चला गया है। हरियाणा में 55 ब्लाक डार्क जोन घोषित कर दिए गए हैं।