विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस. सन् 1996 में वैश्विक स्तर पर विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस की शरुआत हुई और भारत में सन् 1999 में पहली बार यह दिवस मनाया गया। वर्ष 2001-2002 को राष्ट्रीय पुस्तक वर्ष के रूप में सफलतापूर्वक मनाया गया। इसी का परिणाम था कि सन् 2003 में भारत की राजधानी दिल्ली को विश्व पुस्तक राजधानी घोषित किया गया। इससे भारतीय प्रकाशन उद्योग एवं जनमानस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।
23 अप्रैल को ही विश्व पुस्तक दिवस इसलिए चुना गया है क्योंकि इसी दिन कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों, लेखकों का जन्म दिवस अथवा पुण्यतिथि पड़ती है। इसी दिन स्पेन के कैटोलोनिया में सेंट जॉर्ज सन् 1616 को पैदा हुए थे। इन दिनों वहां पर हर पुस्तक क्रेता को एक गुलाब प्रत्येक पुस्तक के साथ देने की परंपरा है। इस दिवस को मनाने के पीछे एक और उद्देश्य किशोरों व युवकों को पढ़ने की ओर रचनात्मक तरीके से मोड़ना है।
सूचना के युग में पुस्तकें आज भी नए तथ्यों, रुझानों, सर्जनाओं को दर्शाती हैं और दुनिया के हर देश व संस्कृति को अपने मूल उद्देश्यों को दूसरों के साथ समन्वय बनाने में अपना योगदान देती हैं ताकि विश्व बंधुत्व व अर्थव्यवस्था जैसी अवधारणाएं मूर्तिमान हो सकें। यह दिवस मेट्रो व बड़े-बड़े शहरों में अब तक अपनी आमद दर्ज करा चुका है परंतु छोटे शहरों में इसके बारे में अभी इतनी जानकारी नहीं है।
आज भी पुस्तक तंत्र अपनी अस्मिता को गाइड तंत्र व पायरेसी से बचाता हुआ लगता है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स एंड बुक सैलर्स एसोसिएशन की मानें तो देश में 16,000 से ज्यादा प्रकाशक हैं। संपूर्ण भारतीय पुस्तक बाजार एक मोटे अनुमान के अनुसार लगभग सात हजार करोड़ रुपए का है। लगभग 80,000 प्रकाशन निकलते हैं जिसमें अनुमानत: 25 फीसदी अंग्रेजी भाषा के होते हैं। ऐसे में नकली पुस्तकों या पायरेसी का दानव हमारे देश को नुकसान पहुंचा रहा है।
24 भाषाओं में पुस्तक प्रकाशित करने वाले भारत देश, जहां पर अंग्रेजी की पुस्तकों का प्रकाशन विश्व के चोटी के समकक्ष है, में कॉपीराइट के प्रावधानों को प्रभावी बनाना व क्रियान्वित करना आज भी एक चुनौती है। इसमें केंद्र व राज्य सरकारों के प्रमुख प्रकाशन संस्थानों समेत विभिन्न अकादमियों, भाषाई संस्थानों का योगदान और अधिक गहन हो सकता है।
यहां अफ्रीकी महाद्वीप की परंपरा का उल्लेख करना जरूरी लगता है। वहां की परंपरा के अनुसार युवाओं द्वारा अनपढ़, बीमार, बूढ़े, अंधे व लाचार लोगों को गांव में विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़कर सुनाई जाती हैं। हमारे देश में ऐसा निश्चित रूप से संभव है क्योंकि हम पुस्तकों को ईश्वर का दर्जा देते हैं। वस्तुत: पर्यटन उद्योग की भांति इनक्रेडिबल इंडिया या अतुल्य भारत की तर्ज पर ‘पढ़ता भारत’ या ‘रीडिंग इंडिया’ जैसा अभियान बेहतर कारगर साबित होगा।
पुस्तकों को पढ़ने, सहेजने, संजोने की आदत आज भी इंटरनेट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सानिध्य से उपजी बेचैनी, अति असहिष्णुता, अवसाद, अकेलापन, अलागाववाद, शॉर्टकट ढूंढने की आत्मघाती प्रवृत्ति को अंगूठा दिखाती है। वस्तुत: पुस्तकें सभी पीढ़ियों की समस्याओं, विभीषिकाओं, असमानताओं को सहज रूप से पहचान कर धीमे परंतु सकारात्मक व सर्वमान्य समाधान प्रस्तुत करती हैं। जहां तक कॅापीराइट का सवाल है तो कॉपीराइट उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। परंतु इस कानून को लागू करना तथा प्रभावी रूप से पालन करवाना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।
भारत सरकार ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत कॉपीराइट अनुभाग की स्थापना पहले से ही कर रखी है ताकि लेखकों, प्रकाशकों, वितरकों, संघकों के हितों की रक्षा बेहद व्यावसायिक ढंग से की जा सके। यहां पर प्रत्येक पुस्तक-प्रकाशन का पंजीकरण होना भी आवश्यक है। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आईएसबीइन (इंटरनेशनल स्टेंडर्ड बुक नंबर) प्रकोष्ठ की स्थापना की है। इससे न केवल भारत में एक निश्चित अवधि में कुल कितनी पुस्तकें-प्रकाशन प्रकाशित हुए का पता लगेगा वरन भारत से बाहर इन प्रकाशित पुस्तकों का बाजार खोजने और एक संतुलित राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने में भी मदद मिलेगी।
अत: विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस पर ये सभी सरोकार न केवल सरकार वरन आमजन के स्तर पर भी अमल में लाए जाने चाहिए। विश्व पुस्तक दिवस तो एक प्रतीकात्मक दिवस है जबकि पुस्तकों का पठन-पाठन, नकली पुस्तक तंत्र, कॉपीराइट को प्रचारित-प्रसारित करने की जरूरत तो पल प्रति पल जारी रहनी चाहिए ताकि फिर किसी प्रदेश की राजधानी विश्व पुस्तक राजधानी होने का गौरव पा सके।
-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।