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कभी सोचो मत कि थक गया हूं

विकास मंत्र. स न् 1997 में मैं तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के साथ ओमान की यात्रा पर गया था। मुझे आश्चर्य होता था कि वहां के लोकप्रिय सुल्तान काबुस बिन सैद अपनी सफेद पोशाक पर पीले रंग की चादर सी डाले हुए हर जगह नजर आ जाते थे। आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उनसे पूछ ही लिया, ‘महामहिम, क्या आप थकते नहीं हैं?’ उन्होंने अपने इस जोरदार उत्तर से मेरे हाथ में थकान का यह जबर्दस्त फॉमरूला थमा दिया, ‘हां मैं थकता नहीं हूं क्योंकि मैं सोचता नहीं हूं।’

यानी थकना बहुत कुछ सोचने पर निर्भर करता है। ध्यान दीजिए कि लड़की की शादी वाले दिन घर वाले भी कहां थकते हैं। लेकिन बारात के विदा होते ही थककर निढ़ाल पड़ जाते हैं। डेढ़ किलो से भी कम वजन वाला हमारा मस्तिष्क हमारे द्वारा ग्रहण की जाने वाली कुल ऑक्सीजन के 20 प्रतिशत भाग का उपभोग करता है। ऐसे में हम जितना अधिक चिंता करेंगे हमारी ऊर्जा उतनी ही अधिक खर्च होगी। एडिसन, बिथोवन, माइकल एंजेलो और गांधी जी जैसे लोग लगातर लगे रहते थे और थकने का नाम ही नहीं लेते थे। जबकि ज्यादातर लोग बिना कुछ किए ही थके रहते हैं।

कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो थके हुओं को देखकर थक जाते हैं। उनके लिए यह थकान जम्हाई आने की तरह एक संक्रामक रोग जैसी होती है। यदि हम एक बार अपने थकने के इस भ्रम को पकड़ लें तो ओमान के सुल्तान की तरह हम भी हमेशा तरोताजा रहने लगेंगे। थकने वाला थका ही रहता है,और न थकने वाला कहीं का कहीं पहुंच जाता है, फिर चाहे वह कछुआ क्यों न हो।

-लेखक समय एवं जीवन प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं।





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