दृष्टिकोण. यह देश टूटने की कगार पर पहुंच रहा है और इसका कारण आबादी की अधिकता नहीं वरन लालच है। ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब किसी टेलीविजन चैनल या अखबार में घोटाले के बारे में खबर न हो या इसमें किसी भ्रष्ट राजनेता की घटिया साजिश को बेनकाब न किया गया हो या पुलिस की जबर्दस्ती की खबरें न हों। और इन सबके ऊपर हमें किसानों की आत्महत्याओं, बलात्कार, हत्याएं, दंगा-फसाद, पारिवारिक कलह और सड़क हादसों के बारे में भी काफी कुछ पढ़ने व सुनने को मिलता है।
यह सब एक ऐसे समाज के लक्षण हैं जो अपने ही गलत कारनामों के चलते बिखर रहा है। भूलभुलैया में फंसे चूहों की तरह हम एक-दूसरे को मारते हुए बस ‘आगे बढ़ते’ जा रहे हैं और इस प्रक्रिया में प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस अनुपम जगत को बर्बाद करते जा रहे हैं।
मैं जानना चाहूंगा कि राजनेता, ठेकेदार और दूसरे अवसरवादी तत्व ऐसी खबरें पढ़कर क्या करते हैं? क्या वे मन ही मन उन पर्यावरणविदों को कोसते हैं, जब प्रकृति और उसके संसाधनों को बर्बाद करने की बड़ी ही सावधानी से बनाई गई उनकी योजनाओं का विरोध किया जाता है? हमें यह जानकर कितना भी बुरा लगे, लेकिन सचाई यही है कि ‘हमारे’ पास नहीं वरन ‘उनके’ हाथों में इस देश के भविष्य की कुंजी है।
लोकतंत्र में हमें ही बागडोर संभालनी चाहिए, लेकिन हम कुछ इस तरह का मौनव्रत धारण करके चलते हैं जो हमें लोकतंत्र का सबसे अद्भुत औजार यानी खुलकर बोलने के इस्तेमाल से रोकता है।
जब तक इसके खिलाफ आम जनता आवाज नहीं उठाएगी, हमारे खुली जगहों का इसी तरह शोषण होता रहेगा। और नए उद्योग स्थापित हो चुके होंगे, जिससे वातावरण का प्रदूषण बढ़ेगा। ट्रैफिक जाम की स्थिति विकट हो जाएगी। अपराध बढ़ जाएंगे। काफी पेड़ काटे जाएंगे, जलीय स्रोतों को भर दिया जाएगा और बहुत से बाघ मारे जाएंगे। यह सब विकास के नाम पर होता है, जिसकी भूख कभी नहीं मिटती।
ऐसे में सवाल यह है कि हम कहां जा रहे हैं? एक तरफ, हमारे यहां स्कूली बच्चे, गृहणियां, अध्यापक, पत्रकार, पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता तमाम बड़े शहरों में जीवनचर्या की हालत सुधारने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी तरफ, बड़े-बड़े बाहुबली हमारे शहरों, वनों, तटीय प्रदेशों और हमारी जिंदगी को पैसों और वोट की खातिर निचोड़ रहे हैं। मैंने अपनी अनमोल प्राकृतिक विरासत, जिसे हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा, को बचाने के लिए तीन दशक से ज्यादा समय तक संघर्ष किया। लेकिन जब इस विरासत को बचाने की हमारी बारी आई तो मैंने पाया कि ‘पीड़ित’ तीन अलग-अलग समूहों में बंटे हुए हैं:
1- पहला, ऐसे ‘कुंभकर्णे’ का बड़ा वर्ग है जो बिलकुल अनजान है कि उनके जीवन में घुल रहा यह भावनात्मक और भौतिक जहर चंद लालची लोगों की देन है। इस समूह में हर कोई यह महसूस करता है कि कुछ गलत है, लेकिन उन्हें इसके कारण की कोई जानकारी नहीं है। वे मौसम के बदलाव या राजनीतिक लोलुपता को दोष नहीं देते। वे अपने भाग्य को दोषी ठहराते हैं।
2- दूसरा, अग्रिम मोर्चे पर एक छोटी सी सेना जिसमें शामिल हैं टाइगर वॉच के डॉ. धर्म्ेद्र खांदल, जो राजस्थान में रणथंबौर के बाघों को बचाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। वाइल्ड लाइफ सोसाइटी ऑफ उड़ीसा के विश्वजीत मोहंती जो जीवन की बुनियादों को ध्वस्त करने से बाहुबलियों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा नल्लामलाई फॉउंडेशन के प्रणय वाघरे जिन्होंने आंध्रप्रदेश में कोल्लेरु के मछली माफिया से लोहा लिया। ऐसे लोग ‘कुंभकर्णे’ को नींद से जगाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। उनके पास अपने बलबूते परिस्थितियों को बदलने की ताकत या अधिकार नहीं हैं। उन्हें उम्मीद है कि कुंभकर्ण्ी नींद से जागने वाले तकरीबन सभी इस भारत बचाओ समूह में शामिल हो जाएंगे।
3- तीसरे हैं गिरगिट प्रवृत्ति के लोग, जो जागते हुए भी कुंभकर्ण्ी नींद में सोने का दिखावा करते हैं। वे पहले वर्ग के ‘कुंभकर्णे’ के साथ इस कदर मिले हुए हैं कि उन्हें अलग करके देखना बहुत मुश्किल है। बहुत करीब से देखने से ही पता चल सकता है कि ये छद्म ‘कुंभकर्ण’ तो महज सोने का दिखावा कर रहे हैं। अपीलों, याचिकाओं और उपदेशों का उन पर कोई असर नहीं होता। वे अब भी परियोजनाओ के और विस्तार के लाइसेंस पाने के लिए उग्र तरीके से लॉबिंग करते हैं, अब भी ज्यादा प्लॉट्स पर कंस्ट्रक्शन करते हैं, हमारे संकटग्रस्त देश का शोषण करने के लिए बड़े-बड़े सौदे करते रहते हैं।
व्यवस्था बदलने की यदि कोई कारगर दीर्घकालीन रणनीति है तो वह है लोगों को कारण और परिणाम के बारे में बताना और उन पर सही काम करने का भरोसा रखना। यह एक जटिल और धीमी प्रक्रिया है, लेकिन यह कारगर है। कर्मठ व्यक्ति इसे ‘जनाधार को लामबंद करना’ कहते हैं, अध्यापक इसे शिक्षण कहते हैं, राजनेता और बड़े-बड़े कारोबारी आमतौर पर इसे भीड़ को उकसाना मानते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी संभवत: जनता को एकजुट करने की कला में सबसे ज्यादा माहिर थे। सक्रिय कार्यकर्ता आज भी गांधीजी की इस असाधारण काबिलियत पर विस्मय जाते हुए उनके साहस, दूरदर्शिता और सामरिक योग्यता पर ईष्र्या करते हैं।
यदि गांधीजी आज जीवित होते तो वे संभवत: कांग्रेस छोड़ कर इंडियन नेशनल ग्रीन पार्टी बना चुके होते और उनका इकलौता एजेंडा होता ऐसे उचित, दीर्घकालिक विकास के लिए संघर्ष करना जो प्रकृति को बाकी सभी चीजों पर तरजीह दे। और वे सबसे पहले अपने दल में पूरे भारत में बाघों को बचाने में लगे दस लाख से भी ज्यादा उन युवाओं को भर्ती करते जो बाघ संरक्षण के लिए संघर्ष करने के साथ-साथ बड़ों को यह भी समझाना चाहते हैं कि वे शहरों में प्रदूषण की मात्रा कम करें, संसाधनों का अपव्यय न करें और पानी, हवा और भोजन को दूषित होने से बचाएं। यह चुनिंदा युवा भारतीय जानते हैं कि ऐसे ‘कुंभकर्णे’ को जगाना कितना मुश्किल है। इसलिए अपनी मासूमियत और संकल्प के साथ, वे अपना अनमोल जीवन आप जैसे असली कुंभकर्णे को जगाने में क्यों न लगाएं?