संपादकीय. तीसरे लोक सेवा दिवस समारोह के अवसर पर देश के लोक सेवकों को प्रधानमंत्री से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रही होंगी, क्योंकि छठे वेतन आयोग की सिफारिशें आने के बाद भारतीय लोकसेवा के कुछ हिस्सों की ओर से अपने हक की अनुगूंज सुनाई पड़ रही थीं। प्रधानमंत्री ने इसको संज्ञान में भी लिया, लेकिन उनका सारा जोर लोक सेवकों की जवाबदेही पर केंद्रित रहा।
किसी भी सरकार का प्रदर्शन उसके प्रशासनिक तंत्र और लोक सेवकों के रवैये पर निर्भर करता है। यदि यह तंत्र निष्पक्ष, कुशल और संवेदनशील न हो तो सरकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाना कठिन है। किसी भी सरकार को इस पर कोई एतराज नहीं होगा कि उनके लोक सेवकों के वेतन-भत्ते और कार्य स्थितियां ऐसी हों कि उसमें उसका जीवन सम्मानजनक ढंग से चल जाए और वह सुचारू रूप से अपने कर्तव्यों का पालन कर सके। लेकिन इसके साथ ही जवाबदेही और पारदर्शिता की शर्ते अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं। प्रधानमंत्री की यह चिंता अनावश्यक नहीं है कि आज हमारे लोक सेवकों को समाज का कोई वर्ग अपना हितैषी नहीं समझता।
यह छवि न तो एक दिन में बनी है और न ही अपवादों के आधार पर बनी है। अंग्रेजों की नौकरशाही का यह ‘लौह ढांचा’ जब आजाद भारत में जस का तस अंगीकार किया गया था तब अपनी कार्य कुशलता, प्रभाव और अखिल भारतीय समरूपता के नायाब गुणों से इसने अपना औचित्य सिद्ध किया था। लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, राजनीतिकरण और अकुशलता के दीमक ने इसे खोखला करके अप्रसांगिकता के मुकाम पर पहुंचा दिया।
यही वजह है कि आज जब इसके वैकल्पिक ढांचे की खोज पर चर्चा होती है तो इसके बचाव में कोई सामने नहीं आता। दरअसल यह तंत्र इतना निर्मम और पतोन्मुख हो चुका है कि इसमें प्रवेश करने वाला उत्साही, ईमानदार और संवेदनशील लोक सेवक भी जल्द ही घुटन और कुंठा का शिकार हो जाता है। इस ढांचे की बुनियादी जवाबदेही किसी नेता या राजनीतिक दल के प्रति न होकर इस देश, समाज और इसके लोगों के प्रति है। यदि हमारा तंत्र इतना सुनिश्चित कर ले जाता है तो बाकी उसे वेतन भत्ते या किसी अन्य चीज की चिंता की जरूरत नहीं रह जाएगी।