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सावधान! आपकी ‘कलम’ को कोई चुरा न ले

जालंधरकभी कहते थे ‘कलम’ (लेखन) अमर होती है, उसे कोई चुरा नहीं सकता, मगर फिर इस धारणा को भी बदलने वाले पैदा हुए उन्होंने ‘कलम’ को ही चुराने शुरू कर दिया। ऐसे में कहने लगे कि ‘कलम’ के दुश्मनों से सावधान, मगर अब आलम ये है कि लिखें तो सावधानी से और साथ ही कॉपीराइट करवा लें, क्योंकि आपकी ‘कलम’ को चुराना वाले साथ ही हैं।

सिटी से जुड़े कुछ सीनियर राइटर। हालांकि इनका कहना है कि पंजाबी व हिंदी साहित्य से जुड़े राइटर लेखन का कॉपीराइट या पै टेंट जैसा स्टैप नहीं उठाते बल्कि पब्लिशर ही प्रकाशन के कॉपीराइट रिजर्व रखता है। इसमें लेखक अगर चाहता है तो वो अपने कॉपीराइट प्रकाशक को बेचता है, जबकि वह नहीं चाहता तो वह इसका कॉपीराइट रखने का खुद अधिकृत है।

बावजूद इसके अपनी कलम यानि रचना को प्रकाशन तक सावधानी से रखना होगा, ताकि कॉपीराइट आप ही का रहे। आज वल्र्ड बुक एंड कॉपीराइट-डे पर राइटर्स औैर पब्लिशर्स ने बताया कि पब्लिक का बुक्स के प्रति क्रेज व कॉपीराइट स्टेट्स।

कम हो रही है रिडिंग हैबिट

लेखकों की मानें तो वल्र्ड बुक्स एंड कॉपीराइट डे को कॉपीराइट के नजरिए से कम और बुक्स के प्रति क्रेज पैदा करने के लिए ज्यादा सैलीब्रेट करना चाहिए। क्योंकि पंजाबी राइटर्स के साथ कॉपीराइट की दिक्कत कम है, हालांकि कॉपी करने यानि रचना की नकल करने वालों की कमी नहीं है। इनका कहना है कि इस दिवस को वुक्स अवेयरनैस के नाम करना चाहिए। यहां पढ़ने वालों की कमी है, तो अब बेहतर लिखने वालों की भी कमी है, क्योंकि कंप्यूटर और मोबाइल से ही यूथ को फुरसत नहीं मिल रही है। इसलिए उनकी रूचि लेखन में नहीं बन रही है। इसमें सरकार के पूर्ण सहयोग की जरूरत है, ताकि लेखकों की कमी महसूस न हो।

युवा लेखक भगवंत रसूलपुरी का कहना है कि अगर हम किसी भी विषय पर रचना लिखने बैठते हैं तो पहले उस विषय से संबंधित सारी पुरानी रचनाएं पढ़ते हैं और सामज में लोगों के साथ बैठकर उन्हें चर्चा करते हैं, ऐसे में हमारी सोच तो बरकरार रहती है, जबकि चुराने वाला विषय चुरा सकता है, संवेदनता व अहसास या सोच नहीं। पब्लिक स्पीकिंग में शामिल रहता है कि हमारी रचना का विषय किसी पुरानी रचना से मिलता-जुलता न हो।

लेखक अनेमम सिंह किसी भी रचना को लिखने से पहले हर लेखक को विषय की पूरी रिसर्च करने पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि हिस्ट्री व समाज शास्त्र से जुड़ी किताबों को पढ़ना चाहिए। संभव हो तो समाजिक तथ्यों से जुड़े लोगों से भी इस बारे में बातचीत करनी चाहिए। नए लेखकों के लिए ये जरूरी है कि किताबों को पब्लिश करवाने से पहले अखबारों में छपवाएं, ताकि विरोध व उससे जुड़ी बातें किताब से पहले बाहर आ सकें।

लेखक मोहन भंडारी का कहना है कि रचना में ह्यूमन एंगल हो और रचनात्मक होने की सोच लेखक की है, तो उसके लेख को कोई चुरा व नापंसद नहीं कर सकता। इसलिए लेख में खूब रस हो जो पड़ने वाले को आकर्षित करे। आजकल के लेखकों को समाज से जुड़े तथ्यों पर ही लिखें।

दीपक पब्लिकेशन के ऑनर जीवत राय शर्मा ने बताया कि कापी राइट के तहत लेखक की रचना को कानूनी तौर पर कोई कापी नहीं कर सकता। न ही लेखक बिना आज्ञा किसी दूसरेपब्लिशर से अपनी रचना पब्लिश करवा सकता है। यूथ में रिडिंग और राइटिंग हैबट बढ़ाने के लिए सरकार को लाइब्रेरी डायरैक्टोरेट का निर्माण करना चाहिए, ताकि लेखकों की संख्या में इजाफा हो सके।

कुकनुस पब्लिकेशन के ऑनर रजिंदरविमल का कहना है कि सिटी में रिडर्स की संख्या में कोई इजाफा नहीं हुआ है, खासकर यूथ में तो बिल्कुल भी नहीं।





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