आर्थिक परिदृश्य अगर सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन का वाहक होता है, तो सामाजिक व्यवहार से भी आर्थिक परिदृश्य निर्धारित होते हैं। भारत में एक खास वर्ग को अलग कर दिया जाए, तो अधिसंख्य परिवारों की प्राथमिक चिंता बढ़ते खर्च को पूरा करने की है। ऐसे हर परिवार का बजट चरमरा गया है और इसके चिंताजनक सामाजिक परिणाम सामने आ रहे हैं। लेकिन इसका कारण केवल महंगाई की बढ़ती रफ्तार नहीं वरन परंपरागत भारतीय परिवारों की बदलती खर्च प्रवृत्ति है।
भारत इस समय दुनिया का 12वां सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। इंडियन सेंटर फॉर मैनेजमेंट रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 2002 एवं 2007 के आम भारतीय परिवारों के उपभोग व्यय की तुलना करें तो यह साफ दिखाई देगा कि भोजन, कपड़ा एवं जीवन की अन्य जरूरतों पर होने वाला खर्च तो स्थिर है लेकिन गैर जरूरी मदों मसलन मनोरंजन आदि पर खर्च बढ़ गया है।
इस रिपोर्ट ने यद्यपि लोगों के पास खर्च करने योग्य धन की बढ़ोतरी को इसका कारण माना है, किंतु यह भी कहा गया है कि अच्छा दिखने और अच्छा महसूस करने की इच्छा के कारण भी इन मदों पर खर्च बढ़ता जा रहा है। एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज की हाल में जारी मेट्रोपॉलिटन शहरों के खर्च आचरण संबंधी सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले पांच सालों में खर्च की प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य आवश्यकताओं के अलावा मनोरंजन, फिटनेस सेंटर, बाहर खाने, बेहतर दिखने आदि पर खर्च बढ़ा है।
यह कतई अस्वाभाविक नहीं है। जब भोग-उपभोग को आर्थिक विकास का मापदंड बना दिया जाएगा तो फिर समाज तो इससे प्रभावित होगा ही। इस रवैये के कारण सरकारी नीतियां भी उपभोग खर्च को अधिकाधिक बढ़ावा देने की हैं। शहरी मध्यवर्ग का एक तबका इस विचारधारा से प्रभावित होकर गैर आवश्यक सामग्रियों की खरीद कर रहा है। वास्तव में 1991 के उदारीकरण ने आम परंपरागत परिवारों के उपभोग संबंधी रवैये एवं जीवन शैली में मूलभूत परिवर्तन ला दिया है।
आत्मसंयम और पैसा बचाने की सोच अब निर्थक हो रही है। न्यूनतम उपभोग से अधिक खर्च करने या फिर निजी सुख-सुविधाओं, भोग-विलास पर खर्च करने को अनैतिक मानने की मानसिकता धीरे-धीरे खत्म हुई है, खासकर युवा पीढ़ी में। भारत में युवा पीढ़ी की आबादी ज्यादा है जिसका प्रभाव परिवारों पर बढ़ रहा है। 1991 में औसत परंपरागत परिवार की खरीद सूची में आठ उत्पाद श्रेणियां थीं, जबकि 2007 में यह 17 हो गई हैं।
इनमें मोबाइल, उपहार, विलासिता संबंधी अन्य सामग्रियां शामिल हैं। बाजार का समाज शास्त्र बहुत सीधा है। चारों ओर ऐसा माहौल बनाओ कि लोगों के भीतर अत्यधिक भोग की चाहत पैदा हो एवं सामग्रियों की विविधता के साथ खरीदने की ताकत देने का तंत्र भी उपलब्ध कराओ। तो सामान उपलब्ध है और खरीदने के लिए कर्ज की एक से एक मोहित करने वाली योजनाएं।
समाज में सामूहिक व्यवहार से बिलकुल अलग आचरण करने वाले व्यक्ति विरले ही मिलते हैं। खर्च की प्रवृत्ति एक-दूसरे की देखा-देखी बदलती है। इस प्रक्रिया में कहीं ठहराव तो है नहीं। नई पीढ़ी वाले ऐसे परिवारों में, जो कॉल सेंटरों जैसे आधुनिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, अचानक पैसे के साथ वहां की जीवन शैली भी प्रवेश कर जाती है। नतीजतन जिसे हम गैर आवश्यक मद मानते हैं वही इस जीवन शैली में आवश्यक मद बन जाता है।
दोनों पति-पत्नी रोजगार वाले एकल परिवारों में तो बाहर खाना अब दैनिक चर्या का हिस्सा होता जा रहा है। बड़े शहरी परिवार भी समय-समय पर बाहर खाने की आदत के शिकार हो रहे हैं। इसे देखकर बड़े हो रहे बच्चों में बाहर खाने को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानने की मानसिकता घर कर जाती है। इस प्रकार समाज का विकास ही बढ़ते खर्च की प्रवृत्ति के अनुरूप हो रहा है।
कोई यदि यह मान रहा है कि खर्च की यह प्रवृत्ति केवल शहरों तक सीमित है, तो यह उसकी भूल है। हाल ही में घरेलू खर्च संबंधी एक अध्ययन रिपोर्ट में साबित किया गया है कि ग्रामीण एवं शहरी परिवारों के बीच खर्च की राशि में तो अंतर है, लेकिन प्रतिशत के अनुसार जिस मद में शहरी जितना खर्च करते हैं उस मद में उतना ही ग्रामीण आबादी भी कर रही है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कंपनियां या अन्य संस्थाएं इसे भारत के लिए जितना लाभकारी बताएं, स्थिति यही है कि आम परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है।
एसोचैम की रिपोर्ट बताती है कि पति-पत्नी की दोहरी कमाई वाले 45 प्रतिशत दंपती अपनी कमाई का बड़ा भाग कर्जो की मासिक किस्त चुकाने पर खर्च कर रहे हैं। परिवारों में तनाव, कलह, अवसाद से लेकर अनैतिक व्यवहार व अपराध की प्रवृत्ति सामने आ रही हैं। इस खर्च आचरण के भयावह प्रभावों का एक सच युवाओं में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति के रूप में सामने आया है। युवा अपने महंगे शौक को पूरा करने के लिए अपराध कर रहे हैं। इन निजी व सामाजिक दुष्परिणामों से बचने के लिए ऐसी अंधाधुंध खर्च वाली जीवन शैली को तिलांजलि देने की आवश्यकता है।