दृष्टिकोण. पाकिस्तान की नई सरकार के लिए अपदस्थ जजों को रिहा करना तो बहुत आसान था लेकिन बलूच नेताओं के खिलाफ दर्ज झूठे केसों को वापस लेने में उसे मुश्किल पेश आ रही है। पाकिस्तान के नवनियुक्त प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने पिछले महीने नेशनल एसेंबली में बहुमत हासिल करते ही नवंबर 2007 से नजरबंद जजों की रिहाई का आदेश दिया। एक घंटे के भीतर ही पुलिस ने उनके हुक्म की तामील की।
इन्हीं गिलानी साहब ने जब बलूच नेता अख्तर मेंगल के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लेने के लिए कहा, तो उनके इस आदेश पर अमल नहीं हुआ क्योंकि अख्तर के खिलाफ सेना भी शामिल है। अपनी मंशा के बावजूद गिलानी को बलूचिस्तान सूबे में अपनी हुकूमत जमाने में मुश्किलें आ रही हैं। 18 फरवरी को बलूचिस्तान में हुए चुनावों में खुलकर हेराफेरी हुई।
मुशर्रफ की समर्थक मुस्लिम लीग को सिर्फ बलूचिस्तान में बहुमत मिला, लेकिन मुशर्रफ के सभी चुने हुए प्रतिनिधियों ने गिलानी की पीपुल्स पार्टी को अपना समर्थन दे दिया। बलूचिस्तान में पीपुल्स पार्टी ने अपनी सरकार बनाई। इस प्रांत के नए मुख्यमंत्री रायसानी ने अपने इलाके में सैन्य अभियान पर रोक लगाने की मांग की। उन्होंने कराची सेंट्रल जेल में बंद अख्तर मेंगल को फूल भेजे। प्रधानमंत्री गिलानी ने भी सम्माननीय बलूच नेता के खिलाफ मुकदमे वापस लेने का आदेश दिया, लेकिन प्रशासन ने इसे कुछ कानूनी पेंचों में उलझा दिया।
सत्ताधारी गठबंधन में इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि यदि सिंध सरकार मेजर कलीम केस में उच्च अदालत से एमक्यूएम के खिलाफ अपनी अपील वापस ले सकती है, तो बलूच नेता के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस क्यों नहीं लिए जा सकते। गौरतलब है कि एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन को 1994 में एक आतंकवाद-निरोधक कोर्ट(एटीसी) ने उनकी अनुपस्थिति में दोषी ठहराया था, लेकिन सिंध सरकार ने 2007 में केस वापस ले लिया।
पाकिस्तान में नए लोकतंत्र के लिए यह केस असल कसौटी बन गया है। प्रधानमंत्री के घरेलू मामलों के सलाहकार रहमान मलिक ने हाल ही में कराची सेंट्रल जेल में अख्तर मेंगल से मुलाकात की और जमानत पर रिहाई की पेशकश की, लेकिन उन्होंने अपने उन गार्डस और पार्टी कार्यकर्ताओं के बगैर जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया जिन्हें पाकिस्तानी सेना के एक हवलदार कुर्बान हुसैन की शिकायत पर पूर्व प्रशासन ने गिरफ्तार कर लिया था।
अख्तर मेंगल पर कई मामले दर्ज हैं जिनमें से एक देशद्रोह का भी मामला है जो सैन्य कार्रवाइयों के खिलाफ दिए गए उनके सार्वजनिक भाषणों के चलते दर्ज किया गया। उन्हें दो साल पहले तत्कालीन डायरेक्टर जनरल मिलेट्री इंटेलीजेंस मेजर जनरल नदीम एजाज के आदेश पर गिरफ्तार किया गया। उन्हें सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि उनके सुरक्षाकर्मियों ने इंटेलीजेंस के कुछ लोगों को रोका था। पाकिस्तानी सेना के हवलदार कुर्बान हुसैन ने 5 अप्रैल 2006 को पुलिस स्टेशन में अख्तर और उनके चार गार्डस के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराई।
जब अख्तर के नाते-रिश्तेदारों ने स्कूली बच्चों का पीछा करने वाले लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करानी चाही, तो उन्हें इनकार कर दिया गया। इसके बाद अख्तर के हवाले से सिंध हाईकोर्ट में एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए एक संवैधानिक याचिका दायर की गई। 13 अक्टूबर को एक अदालत ने एटीसी को चारों आरोपियों के खिलाफ कोई भी निर्णय देने पर रोक लगा दी। रोक के इस आदेश के बावजूद एफआईआर में दर्ज अख्तर के चारों गार्डस को 9 दिसंबर 2006 को एटीसी द्वारा दोषी ठहराते हुए उम्रकैद समेत कई तरह की कैद की सजा सुना दी। इन चारों पर 140000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया।
28 नवंबर 2006 को बलूचिस्तान पुलिस ने अख्तर मेंगल को उनके 14 पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया और बाद में उन्हें एटीसी के सामने पेश किया गया। कोर्टरूम में उन्हें अपने वकील से दूर एक लोहे के पिंजरे में बैठने के लिए विवश किया गया। इससे पता चलता है कि शासन व्यवस्था उनसे किस हद तक नफरत करती थी। पीपीपी की पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो ने हमेशा अख्तर के खिलाफ केस वापस लेने की मांग की। पीपीपी के सह-अध्यक्ष आसिफ अली जरदारी उनके खिलाफ सभी मामले वापस लेना चाहते हैं लेकिन पुरानी व्यवस्था के कुछ सक्रिय घटक इसमें कानूनी पेंच ले आए हैं।
ऐसा पता चला है कि सरकार सभी बलूचियों को आम माफी देने के बारे में सोच रही है सिवाय बरहमदाग बुगती के, जिसके अफगानिस्तान में छिपे होने की खबर है। बलूचिस्तान के कुछ संसद सदस्यों ने प्रधानमंत्री को सलाह दी है कि बरहमदाग बुगती को भी आम माफी दी जानी चाहिए। सरकार अख्तर मेंगल से यह आश्वासन लेने की फिराक में है कि वे बरहमदाग बुगती का समर्थन नहीं करेंगे लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री ने इस संदर्भ में ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया है। अख्तर मेंगल अपदस्थ जजों की बहाली की राह देख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि बहाल होने के बाद न्यायाधीश उनके साथ न्याय करेंगे।
कुछ ही लोग जानते हैं कि यह ‘छलिया’ अकबर बुगाती ही थे जिन्होंने इस प्रांत का मुख्यमंत्री बनने के बाद 1988 में जस्टिस इफ्तेखार मोहम्मद चौधरी को बलूचिस्तान का महाधिवक्ता नियुक्त किया था। बाद में चौधरी बलूचिस्तान हाईकोर्ट के जज और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वर्ष 2006 में बुगाती पाकिस्तानी सेना द्वारा मार दिए गए, तब चौधरी मुख्य न्यायाधीश थे। वे चुप रहे लेकिन बहाली के बाद उन्हें चुप नहीं रहना चाहिए।
बलूचिस्तान के लोगों को उनसे बहुत उम्मीद है। अप्रैल के आखिरी हफ्ते(संभवत: 25 अप्रैल को) संसद द्वारा वे बहाल हो जाएंगे और यह उम्मीद है कि अपनी बहाली के तुरंत बाद चौधरी अपने प्रांत में संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करेंगे। उन्हें अकबर बुगाती और बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामलों की जांच की पहल करनी होगी और अख्तर मेंगल को न्याय दिलाना होगा।