भोपाल.
पर्यावरण के लिए खतरा बनी पालीथिन और वेस्ट प्लास्टिक से निजात पाने का रास्ता प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने ढूंढ निकाला है। अगर सबकुछ ठीकठाक रहा तो यहां-वहां बेतरतीब बिखरा रहने वाला पालीथिन गरीबों की आय का जरिया बन जाएगा,क्योंकि इसका इस्तेमाल सीमेंट और पावर उद्योग में वैकल्पिक ईधन के रूप में होने जा रहा है।
राज्य के कुछ सीमेंट उद्योग भट्टी जलाने के लिए कोयले के साथ पालीथिन का इस्तेमाल करने की रणनीति को अंतिम रूप देने जा रहे है। इसका सफल परीक्षण एसीसी सीमेंट के कैमोर कारखाने में हो गया है।
सूत्रों के मुताबिक सीमेंट उद्योग में कच्चे माल के विकल्प के रूप में पालीथिन के उपयोग की तरफ मंडल के वैज्ञानिकों का ध्यान गया है। अब तक इस तरह का प्रयोग चीन समेत अन्य विकसित देशों में हुआ है, पर भारत में इस तकनीक का इस्तेमाल पहली बार होने जा रहा है।
मंडल के वैज्ञानिकों की पहल पर एसीसी सीमेंट फैक्टरी कैमोर के वैकल्पिक ईधन एवं कच्चमाल विभाग के प्रमुख यूबी पलनीटकर,प्लांट प्रमुख विवेक चावला और वर्क्स मैनेजर सुनील गुप्ता गुरुवार को भोपाल पहुंच रहे है। वे प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सभाकक्ष में प्रस्तावित प्रोजेक्ट के बारे में प्रस्तुति देंगे। इस मौके पर आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया भी उपस्थित रहेंगे।
कैसे होगा पालीथिन का इस्तेमाल-कैमोर के सीमेंट प्लांट में भट्टी का तापमान बनाए रखने के लिए रोजाना न्यूनतम 700 टन कोयला लगता है। कोयले के साथ वैकल्पिक ईधन के रूप में मात्र एक प्रतिशत यानि सात टन पालीथिन के उपयोग की योजना है।
क्या होगा फायदा-पालीथिन के निपटान की समस्या कम करने में मदद मिलेगी और कोयले की बचत हो सकेगी। भट्टी में पालीथिन डालने से ग्रीन हाउस को क्षति पहुंचाने वाली गैस भी नहीं निकलेगी। पर्यावरण की रक्षा में मदद मिल सकेगी। बिजली बनाने में लगने वाले कोयले की खपत भी घटेगी।
सीमेंट उद्योग से ही बिजली पैदा करने की तैयारी-सतना सीमेंट फैक्टरी ने कारखाने से निकलने वाली गर्म गैस को बायलर के माध्यम से टरबाइन में भेजकर उससे बिजली पैदा करने का काम शुरु कर दिया है। इसके लिए मौजूदा कारखाने में ही मिनी थर्मल पावर प्लांट लगाने की तैयारी तेज हो गई है। सूत्रों ने बताया कि सीमेंट तैयार करने के लिए भट्टी में चूना और क्ंिलकर मिलाकर डाला जाता है,जिससे सीमेंट बनता है। इसके लिए भट्टी का तापमान 1400 से 1500 डिग्री सेल्सियस रखना पड़ता है।
सीमेंट बनने के बाद चिमनी से जो गर्म गैस निकलती है उसका तापमान 300 से 350 डिग्री सेल्सियस रहता है। इस गैस को बायलर के माध्यम से टरबाइन में भेजकर बिजली पैदा की जा सकती है। इस तरह बीस से तीस मेगावाट के छोटे थर्मल पावर प्लांट लगाने का रास्ता साफ हो गया है। इस दिशा में सतना सीमेंट ने कार्रवाई तेज कर दी है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो पूरे प्रदेश के तीस सीमेंट उद्योग इसे अपना सकते है। इससे प्रदेश में पांच सौ मेगावाट बिजली पैदा हो सकेगी।
पालीथिन के सहायक ईधन के रूप में इस्तेमाल का परीक्षण 30 मार्च को कैमोर सीमेंट फैक्टरी में कर लिया गया है। इस बात की जांच भी कर ली गई है कि यह प्रयोग पर्यावरण के लिए किसी तरह से घातक तो नहीं है। इसके बाद ही इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में मंजूरी देने पर विचार किया जा रहा है। सीमेंट प्लांट के साथ ही मिनी थर्मल पावर प्लांट भी लगाया जा सकता है।
-डा एसपी गौतम अध्यक्ष प्रदूषण नियंत्रण मंडल मप्र।