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सोने पर रहा तीजणियों का पहरा

जोधपुर. j महिला आरक्षण के पैरोकारों के लिए सूर्यनगरी की यह परंपरा किसी मिसाल से कम नहीं है। न 33 फीसदी का कोई झमेला और न ही कोई राजनीतिक रस्साकशी। एक रात के लिए शहर के भीतरी इलाके में सौ फीसदी महिलाओं का राज। जहां पुलिस का प्रवेश भी वर्जित होता है। किसी पुरुष की दखलअंदाजी का जवाब है डंडे से पिटाई।

दुनिया में अपनी तरह के अनूठे धींगा-गवर (बैंतमार गणगौर) के मेले में बुधवार को रात-भर महिलाओं की धमाल रही। गलियों व चबूतरों पर 21 किलो सोने के आभूषणों से लकदक 11 गवर प्रतिमाओं का लाजवाब श्रंगार और इसे देखने के लिए रात भर उमड़ती रही भीड़। भीतरी शहर में डंडे के दम पर राज करने वाली महिला ब्रिगेड की अभेद्य किलेबंदी का मंजर ही निराला था। मजाल है कि कोई प्रतिमाओं को छूने की हिमाकत भी कर ले। कुछ मनचलों की बेंतों से जमकर धुनाई हुई।

स्थान : सुनारों की घाटी, जोधपुर

आयोजन कब से : 55 साल से

कितना आभूषण : आठ सौ तोला

दर्शन किए बिना घर नहीं लौटतीं : यहां गवर प्रतिमा को सजा रहे रामस्वरूप व कृपाराम सोनी ने बताया कि सबसे पहले गवर प्रतिमा यहां स्थापित की गई थी। जब तक महिलाएं इस गवर के दर्शन नहीं करती, घर नहीं लौटती हैं। डिजाइन के विशेषज्ञ रुपराम सोनी गवर का श्रंगार करते हैं। कुछ आभूषण गवर माता के लिए बनवाए हुए हैं तथा कुछ आभूषण स्वर्णकार समाज के लोगों से एकत्रित किए जाते हैं।

इसलिए होती है धींगा गवर की पूजा

देश भर में महिलाएं अपने सुहाग की रक्षा के लिए तथा कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की कामना के लिए परंपरागत गणगौर की पूजा करती हैं, लेकिन मारवाड़ में इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए सैकड़ों वर्ष पहले सुहागिनों के साथ विधवाओं को भी गणगौर पूजन का अधिकार देते हुए बड़ी गणगौर अर्थात धींगा गवर के पूजन का त्योहार शुरू किया गया।

इसमें बुजुर्ग महिलाएं वधुओं तथा कन्याओं को धींगा गवर की कथा सुनातीं हैं। सोलह दिनों तक पूजन के बाद तीजणियां भोत्तवणी की रात विभिन्न वेश धारण कर हाथों में छड़ी लिए गवरमाता के दर्शन करने निकलती हैं। इस दौरान रास्ते में मिले पुरुषों की छड़ी से पिटाई करती हैं।





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