HomeNewsHaryanaHisar Hisar

कुछ कर गुजरने के जज्बे ने बनाया डीजीपी

रेवाड़ी. dgp स्कूल घर से करीब दो किमी दूर। आने-जाने को साइकिल भी नहीं। बस हौसला था, एक जुनून कुछ कर गुजरने का। परिस्थितियां विषम थीं, लेकिन उस बच्चे ने हार नहीं मानी। अंतत: संघर्ष रंग लाया और वह मुकाम मिला, जिसे पाने का अरमान था। यह संघर्ष गाथा है हरियाणा के पूर्व डीजीपी अजीत सिंह भाटोटिया की।

भाटोटिया जब छोटे थे तब रोजाना डूंगरवास से निखरी तक पैदल ही स्कूल जाते थे। लेकिन पढ़ाई पर थकान कभी हावी नहीं होने दिया। जब कभी पिता उन्हें फौज में भेजने का फैसला लेते, वे यह कह कर इनकार कर देते कि उन्हें अभी और पढ़ना है। पढ़ाई के प्रति इसी जुनून का नतीजा है कि वे राज्य के पुलिस महानिदेशक बने।

भाटोटिया आत्मसंतुष्टि को ही कामयाबी मानते हैं। अपने ऊपर उन्होंने कभी भी अहंकार को हावी नहीं होने दिया। वे बताते हैं कि जब उन्होंने रेवाड़ी के अहीर कॉलेज में दाखिला लिया तो यह भी घर से करीब 8 किमी दूर था। घर के आर्थिक हालात ऐसे नहीं थे कि पिता उन्हें साइकिल खरीद कर दे सकें।

जुनून जो संघर्ष बन गया
उन्होंने बच्चों को टच्यूशन पढ़ाकर साइकिल खरीदी। पढ़ाई के दौरान ही उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। तब उन्होंने धारूहेड़ा स्थित आर्मी यूनिट में उन्हें क्लर्क की नौकरी की। कभी-कभी तो भाटोटिया को लगता कि अब आगे की पढ़ाई संभव नहीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

सीनियर से मिली प्रेरणा
क्लर्क की नौकरी के दौरान उनके सीनियर मिस्टर थॉमस कमीशन की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देखकर भाटोटिया के मन में भी आगे पढ़ने की इच्छा और बलवती हुई। फिर क्या था, बीए प्राइवेट करने के बाद वे कमीशन की तैयारी में जुट गए और सफलता मिलती गई।

हिसार के एएसपी बने
1973 में हरियाणा कैडर मिलने के बाद भाटोटिया ने एएसपी हिसार ज्वाइन किया। डीआईजी सीआईडी, विजिलेंस डायरेक्टर समेत अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहने का मौका मिला। अंत में वे उस पद तक पहुंचे, जिसका सपना हर आईपीएस अधिकारी का होता है। वे हरियाणा के डीजीपी बने। इस दौरान राजनीतिक दबाव भी आया, लेकिन किसी की परवाह नहीं की। सिर्फ वही किया जो आत्मा से आवाज आई।

हिसार के एएसपी बने
1973 में हरियाणा कैडर मिलने के बाद भाटोटिया ने एएसपी हिसार ज्वाइन किया। डीआईजी सीआईडी, विजिलेंस डायरेक्टर समेत अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहने का मौका मिला। अंत में वे उस पद तक पहुंचे, जिसका सपना हर आईपीएस अधिकारी का होता है। वे हरियाणा के डीजीपी बने। इस दौरान राजनीतिक दबाव भी आया, लेकिन किसी की परवाह नहीं की। सिर्फ वही किया जो आत्मा से आवाज आई।

जुनून जो संघर्ष बन गया
उन्होंने बच्चों को टच्यूशन पढ़ाकर साइकिल खरीदी। पढ़ाई के दौरान ही उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। तब उन्होंने धारूहेड़ा स्थित आर्मी यूनिट में उन्हें क्लर्क की नौकरी की। कभी-कभी तो भाटोटिया को लगता कि अब आगे की पढ़ाई संभव नहीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

सीनियर से मिली प्रेरणा
क्लर्क की नौकरी के दौरान उनके सीनियर मिस्टर थॉमस कमीशन की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देखकर भाटोटिया के मन में भी आगे पढ़ने की इच्छा और बलवती हुई। फिर क्या था, बीए प्राइवेट करने के बाद वे कमीशन की तैयारी में जुट गए और सफलता मिलती गई।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: