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हादसों का सबब न बन जाएं मेले के हिंडोले!

मेले का नाम सुनते ही मन में तरह-तरह के व्यंजनों से सजे फूड स्टॉल, चूड़ियों की दुकानें, खिलौने, कॉस्मेटिक्स और हां, झूलों की छवि कौंध जाती है। वास्तव में हमारे गांवों, कस्बों और यहां तक कि बड़े-बड़े शहरों में होने वाले आनंदोत्सवों से मेला इस कदर जुड़ चुका है कि कई फिल्मी गीत मेले को समर्पित किए गए हैं।

लेकिन इस तरह के कार्निवाल के आयोजक यदि सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान न दें, तो कहीं गंभीर नतीजे हो सकते हैं। यहां मैं विशालकाय झूलों की बात कर रही हूं, जो अधिकतर मेलों का अनिवार्य हिस्सा होते हैं। समुचित सुरक्षा और जांच-पड़ताल के अभाव में ये झूले लोगों के लिए मौत के हिंडोलों में तब्दील हो सकते हैं।

वर्ष 2001 में हरियाणा के प्रख्यात सूरजकुंड शिल्प मेला में दुर्भाग्यवश ऐसा ही हुआ। इस मेले में एक विशालकाय नाव के आकार का झूला, जिसमें बीस लोग एकसाथ बैठ सकते थे, लगाया गया। जैसे ही झूला पचास फीट से भी ज्यादा ऊंचाई तक जाता तो इसमें बैठे लोग मारे भय और रोमांच के चिल्लाने लगते। लेकिन यह क्या! अचानक यह नाव पलट गई और इसमें बैठे लोग जमीन पर आ गिरे। यहां तक कि निम्नस्तरीय विशालकाय झूले में ऐसी गड़बड़ी हो, तो इसमें सवार लोग बच सकते हैं, बशर्ते इनमें समुचित सीट बेल्ट लगी हों, जो लोगों को सीट से बांधे रखें।

लेकिन इस झूले में सुरक्षा के नाम पर सीट के आगे महज एक पतला सा डंडा फंसा होता है, जो इसके उलटने पर कोई सुरक्षा नहीं दे सका। इस हादसे में चार व्यक्तियों की मौत हो गई और चौदह लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

1996 में करनाल में लगे एक मेले में झूले की एक पालकी झटका खाकर अलग हो गई और इसमें सवार एक परिवार के सदस्य तेज रफ्तार से बाहर सख्त जमीन पर आ गिरे। सौभाग्य से इस मामले में सभी लोग बच गए, यद्यपि इन्हें गंभीर चोटें र्आई। लेकिन उन्होंने इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार मेले के आयोजकों और इस झूले के संचालकों के खिलाफ केस दायर कर दिया।

हाल ही में यह केस शीर्ष उपभोक्ता अदालत के समक्ष आया। इस केस के संदर्भ में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि मेले के आयोजक इस दुर्घटना की जिम्मेदारी लेने या पीड़ितों को हर्जाना देने के लिए तैयार नहीं थे। यह देखते हुए कि मेला बच्चों के लिए काफी मायने रखता है, मेले में आने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिहाज से हरसंभव उपाय किए जाने चाहिए। इसमें झूलों को सुरक्षित बनाना भी शामिल है।

लेकिन हरियाणा इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आट्र्स, जिन्होंने फुलवारी चिल्ड्रन बाजार का आयोजन किया था, ने शीर्ष उपभोक्ता अदालत के समक्ष दलील दी कि वे इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं हैं और सिर्फ झूले के मालिक व ऑपरेटर ही इसके जवाबदेह हैं। इंस्टीट्यूट की दूसरी दलील थी कि वे उन लोगों से कोई पैसा नहीं लेते, जो मेला घूमने आते हैं और इसलिए उन्हें हर्जाना देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

इन दलीलों को खारिज करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस बात को जतलाया कि पहले तो इंस्टीट्यूट ने जमीन के इस्तेमाल के लिए 7,500 रुपए दिए, लेकिन झूले के मालिक से झूला लगाने के एवज में 10,000 रुपए लिए, जिसने आखिरकार ग्राहकों से पैसा कमाया। इस तरह इंस्टीट्यूट ने अप्रत्यक्ष तौर पर ग्राहकों से फीस वसूली।

यह देखते हुए इंस्टीट्यूट और इसके निदेशक को भी झूले के मालिक और ऑपरेटर के साथ सेवा प्रदाता माना गया। इसके अलावा, यह इंस्टीट्यूट और निदेशक का कर्तव्य था कि वे मेले के आयोजन के लिए किराए पर लिए गए परिसर में लगाने जाने वाले सभी उपकरणों की जांच कर यह सुनिश्चित करते कि वे पूरी तरह सुरक्षित हैं या नहीं।

इन पर फुलवारी चिल्ड्रन बाजार का पूर्ण नियंत्रण था और यह उसका कर्तव्य था कि ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए समुचित सावधानी बरती जाए और पर्याप्त सुरक्षा उपाय अपनाए जाएं। इस तरह आयोग ने उन्हें सेवा में चूक और लापरवाही का दोषी करार दिया।

जिला फोरम, जिसके समक्ष यह केस सबसे पहले दाखिल हुआ, ने इसके लिए सिर्फ मालिक और ऑपरेटर को ही दोषी ठहराते हुए 20,000 रुपए हर्जाना देने का आदेश दिया। राज्य आयोग ने न सिर्फ हर्जाने की राशि को बढ़ाते हुए एक लाख रुपए कर दिया, वरन झूले के मालिक और ऑपरेटर के साथ इंस्टीट्यूट और इसके निदेशक को भी हर्जाना देने के लिए संयुक्त व पृथक रूप से जिम्मेदार ठहराया।

शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने इस फैसले का अनुमोदन करते हुए यह साफ कर दिया कि ऐसे मेलों के आयोजक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। ऐसे आदेश देशभर में इस तरह के मेले व कार्निवाल्स का आयोजन करने वालों को सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त करने के लिए विवश कर सकते हैं। यह उन्हें इस बात को सुनिश्चित करने के लिए मजबूर कर देगा कि मौज-मस्ती के लिए बने मेले त्रासदियों में तब्दील न हो जाएं।





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