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मदद की आस में हवाई अड्डे

भारत के हवाई अड्डों पर क्षमता से अधिक दबाव है और तकनीकी भाषा में कहा जाए तो वे ‘आसन्न संकट’ में हैं। महानगरों में सड़कों पर होने वाले ट्रैफिक जाम हवाई अड्डों के रनवे तक पहुंच गए हैं। विमान एयर ट्रैफिक कंट्रोल(एटीसी) से ग्रीन सिग्नल का इंतजार करने के दौरार्न ईधन बर्बाद करने को मजबूर हैं। इस परिदृश्य की सबसे बुरी बात यह है कि यह सब ऐसी जगह पर हो रहा है, जो देश का प्रवेश द्वार है। एक ऐसे देश का जिसकी आठ फीसदी से ज्यादा विकास दर है, जिसके घरेलू बाजार में उछाल है और सेंसेक्स कुलाचें भर रहा है।

देश के हवाई अड्डे घटिया नियोजन और क्रियान्वयन में देरी के शिकार हैं। राजस्व की कमी एक अवरोध हो सकता है लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि बेंगलुरू एयरपोर्ट को एक दूर-दराज जगह पर सिर्फ इसलिए स्थानांतरित किया जा रहा था ताकि देश के प्रधानमंत्री रहे एक शख्स को खुश किया जा सके। यदि ऐसा हो गया होता तो सोचिए उस बेंगलुरू एयरपोर्ट का क्या होता जो देश की आईटी राजधानी की लगातार बढ़ती जरूरतों को पूरा करता है।

वर्ष 1991 में जब हमने अपनी अर्थव्यवस्था के द्वार दुनिया के लिए खोल दिए, तब हमने इसके परिणामों की कल्पना नहीं की थी। हालांकि हमें पता था कि उदारीकरण के बाद बड़े-बड़े कारोबारी घराने भारत आने के लिए उत्सुक होंगे। हम जानते थे कि देश के नागरिकों की आय बढ़ेगी तो घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या में भी वृद्धि होगी। लेकिन हम इस संख्या का ठीक-ठीक अनुमान लगाने में असफल रहे।

और तो और सरकार ने इस संबंध में एक नीतिगत निर्णय किया कि मांग उठने पर ही ढांचागत सुविधाएं जुटाई जाएंगी। यदि हमने दूरदृष्टि के साथ अग्रिम योजना बनाई होती, तो हमें पता होता कि हमारे हवाईअड्डों पर कितना दबाव होगा। अगर हमने पहले से ही रनवे, पायलटों और विमानों की कमी के बारे में सोचा होता तो आज हालात बिलकुल अलग होते।

दस साल पहले तक भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण(एएआई) वित्तीय तौर पर शक्तिहीन था। एएआई बोर्ड के पास किसी प्रोजेक्ट के लिए महज 50 करोड़ रुपए तक की राशि की मंजूर करने के अधिकार थे। यह हवाईअड्डों के आधुनिकीकरण और विस्तारण के लिए नाकाफी हैं। हालांकि तबसे अब तक इसमें चार गुना वृद्धि हो चुकी है, फिर भी एक स्वतंत्र एयरपोर्ट नियामक संस्था आज के वक्त की जरूरत है। आज हम निजी-सार्वजनिक सहभागिता (पीपीपी) और संयुक्त उपक्रमों की राह पर हैं, लेकिन ऐसे भी मामले हुए हैं, जब हमने ऐसे प्रस्तावों को गंभीरता से नहीं लिया।

हमारा हवाई यातायात तकरीबन एक दर्जन हवाई अड्डों तक ही सिमटा है। देश के साढ़े चार सौ हवाई अड्डों में से हवाई यातायात का 90 फीसदी भार सिर्फ 15 हवाई अड्डों द्वारा ढोया जा रहा है। इन हवाई अड्डों पर पर्याप्त संख्या में रनवे नहीं हैं। ज्यादा से ज्यादा उड़ानों को संभालने की खातिर पायलटों को उड़ान से काफी पहले ही अपने इंजन चालू करने के निर्देश दिए जाते हैं, जिसके चलते बहुमूल्य हवार्ई ईधन का अपव्यय होता है और उनका रखरखाव बिगड़ जाता है।

क्या आप सोच सकते हैं कि हमारे मेट्रो हवाई अड्डे अपनी स्वीकृत क्षमता से कहीं अधिक उड़ानों को संभाल रहे हैं। इसके चलते उड़ानों में देरी होती है और उन्हें घंटों हवाई अड्डे के ऊपर मंडराना पड़ता है। राहत की बात यह है कि एएआई ने इसका संज्ञान लेते हुए हवाई अड्डों पर ओवर-ट्रैफिकिंग को नियंत्रित करने की पहल की है।

हवाई अड्डों पर ओवर ट्रैफिकिंग का एक और आयाम है। जब कोई एयरपोर्ट एक दिन में सिर्फ सौ विमानों को संभाल सकता है, तब इसकी जमीनी सुविधाएं इसके अनुपात में यात्रियों के लिए होती हैं। उड़ानों की संख्या हवाई अड्डों की क्षमता से अधिक होने पर इसके परिसर में गंदगी, साफ-सफाई की कमी, सुरक्षा में चूक, सामान के गुम होने समेत और अन्य अवांछित घटनाओं का अंदेशा बढ़ जाता है।

हवाई अड्डों के आस-पास का माहौल भी अव्यवस्थित हो चुका है। मुंबई एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गंदी झुग्गी-बस्तियां इस शहर की गलत तस्वीर पेश करती हैं। दिल्ली एयरपोर्ट इस मायने में सौभाग्यशाली है कि पड़ोस में कैंटोनमेंट एरिया होने की वजह से यहां झुग्गियां नहीं पनपीं। आपको भरोसा नहीं होगा कि जब योजना आयोग ने एनएचडीपी के अधीन सड़कें बनाने और दूसरे संबंधित कार्यक्रमों का जिम्मा सौंपा तो उसने बंदरगाहों से शहरों को जोड़ने वाली सड़कों के बारे में तो ध्यान रखा लेकिन हवाई अड्डों से शहर को जोड़ने वाली सड़कों के बारे में भूल गया।

कहानी का एक और पहलू है। हवाई अड्डों के चारों ओर की सड़कें राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, जिसकी इन्हें लेकर अलग सोच हो सकती है। कुछ जगहों पर हवाई अड्डे के आस-पास का क्षेत्र स्थानीय पंचायतों के अधीन है। क्या स्थानीय पंचायतों से हवाई यात्रियों के लिए सड़कें बनाने की उम्मीद की जा सकती है?

नागरिक उड्डयन मंत्रालय के आकलन के मुताबिक वर्ष 2012 तक भारतीय आकाश में विमानों की संख्या साढ़े छह सौ तक बढ़ जाएगी। इसके लिए हमें 3000 और पायलट चाहिए होंगे और मजबूत एयरपोर्ट बुनियादी ढांचे की दरकार होगी। एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और एयरक्राफ्ट्स अर्जन योजनाओं के लिए तकरीबन दस अरब डॉलर का निवेश संभावित है और अगले सात वर्र्षो में इसके 40 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

सिविल एविऐशन इंडस्ट्री के बारे में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी- आईसीआरए की एक रिपोर्ट कहती है कि इस उद्योग के विकास में एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी सबसे बड़ा अवरोध साबित हो सकती है। लेकिन एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के वित्त-पोषण के लिए धन कहा है? हम एयरपोर्ट के आधुनिकीकरण के लिए विदेशी निवेश के अंतर्प्रवाह पर निर्भर हैं, जिसे आकषिर्त करने के प्रयास नहीं दिखते।

देर से ही सही, हमने हमने निजी-सार्वजनिक सहभागिता की राह पर अपने दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण करना आरंभ कर दिया है। मेरे विचार से सीमित परिणामों के साथ यह अच्छी शुरुआत है। हवाई यात्रियों की संख्या में प्रति वर्ष 15-20 फीसदी इजाफा हो रहा है। बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी ढांचागत संरचना की विकास की रफ्तार बहुत धीमी है।

वास्तव में, हमारे हवाई अड्डे भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार के साथ चलने में सक्षम नहीं हैं। वे टूट रहे हैं और उन्हें तुरंत मदद की दरकार है।

-लेखक एएआई के भूतपूर्व निदेशक हैं।





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