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श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए मिला सम्मान

चंडीगढ़ मध्यप्रदेश के देवास क्षेत्र में सिर पर मैला ढोने का काम छोड़ने वाली वाल्मीकि समुदाय की सुमित्रा बाई को उसके ही समाज की ओर से निकाल दिया गया। सुमित्रा ने कपड़े की दुकान खोल ली। कपड़े की दुकान इसलिए खोल ली, ताकि समाज के लोग यहां भी अनाज या दूसरी चीजों में फिर छुआछूत न ढूंढे, लेकिन सामाजिक व्यवस्था देखिए कि कोई दूसरा तो क्या अपने ही वाल्मीकि समुदाय का भी कोई आदमी उसकी दुकान पर सामान खरीदने नहीं गया। मजबूरन 6 महीने बाद सुमित्रा को दुकान बंद करनी पड़ी और फिर उसी सिर पर मैला ढोने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह है सामाजिक व्यवस्था की एक सच्ची दास्तां। लिंग के आधार पर मध्यप्रदेश के कई हिस्सों में महिलाओं के साथ होने वाले ऐसे ही भेदभाव पर कई खबरों के लिए ‘दैनिक भास्कर’ भोपाल में चीफ सब एडिटर दयाशंकर मिश्र को शनिवार शाम लॉ भवन, सेक्टर-37 में यूएनएफपीए लाडली अवार्ड-2007 से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान पंजाब के गवर्नर और चंडीगढ़ के प्रशासक जनरल (रि.) एसएफ रोड्रिग्स और पंजाब की स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री लक्ष्मीकांता चावला के हाथों दिया गया।

दयाशंकर मिश्र मध्यप्रदेश में महिलाओं और बच्चों से जुड़े कई सुलगतों सवालों को लेकर खबरें लिखते रहे हैं। मिश्र को इससे पहले मध्य प्रदेश विकास संवाद समिति की ओर से विकास संवाद फैलोशिप भी मिल चुकी है। मिश्र कहते हैं कि उन्होंने अनुभव किया है कि यह समस्या मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी एक जैसी है और इसके लिए पत्रकारिता में होने के नाते हमें आगे आना होगा।

इस समारोह में महिलाओं से जुड़े मसलों के लिए माय एफएम की ओर से चंडीगढ़ की रीजनल प्रोग्रामिंग हेड रितु घई ने बेस्ट टेली फिल्म के लिए गुरमेल चहल को सम्मानित किया। समारोह में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अलावा रेडियो, दूरदर्शन और रंगमंच के सहारे महिलाओं से जुड़े मसलों को उठाने वाले पत्रकारों, निर्माता, निर्देशकों और कलाकारों को सम्मानित किया गया।

सम्मानित होने वालों में द ट्रिब्यून की अदिति टंडन और गायत्री राजवाड़े, टाइम्स ऑफ इंडिया के अनिलेश महाजन, इंडियन एक्सप्रेस लखनऊ की तरन्नुम मंजुल, हिंदुस्तान दिल्ली की सुषमा वर्मा, इंडिया टुडे से दमयंती दत्ता के अलावा अनु आनंद, गंगापुत्र टाइम्स हरियाणा र्ह्िषदर कौर, मोहम्मद अख्तर, अफसाना रशीद, सुल्तान अहमद और सैयद असदर अली को प्रिंट मीडिया से सम्मानित किया गया।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एनडीटीवी चंडीगढ़ के बृजमोहन सिंह, आज तक से रविंद्र बावा, दूरदर्शन से नताशा झा, चैनल पंजाब से अनुप्रीत संधू, चैनल पंजाब के ही सूरज सिंह व राजवीर सिंह के अलावा रेडियो के लिए आकाशवाणी जालंधर, चंडीगढ़ को भी सम्मानित किया गया।

इनके अलावा रंगमंच में संध्यादीप लखनऊ, गुरशरण सिंह पटियाला, शुभा हरियाणा, रमन मित्तल, गुरमेल चहल के अलाव क्रिएटिव मीडिया में अविनाश और संध्या रमन को भी सम्मानित किया गया।

डिपेंड करता है इश्यू को कैसे करें हैंडल

पत्रकार की प्रोफेशनल मजबूरियों के बावजूद यह प्रायोरिटी पर डिपेंड करता है कि हम सोशल इश्यू के लिए कितने कमिटिड हैं। यह जरूरी नहीं कि मैं क्राइम या एजूकेशन बीट ही देखती हूं, लेकिन देखना यह होता है कि अगर मैं क्राइम में रेप की न्यूज कवर कर रही हूं तो उस खबर को रूटीन की खबर मानकर करूं या सेंसिटिव एप्रोच से करूं। असल में देखना यह चाहिए कि हम किसी भी इश्यू के लिए सेंसिटिव कितने हैं और उस इश्यू को लिखते वक्त हैंडल कैसे करते हैं। रही अवॉर्ड की बात तो जरूरी नहीं कि हम यह देखें कि हमें अवार्ड मिला है बल्कि यह देखना है कि यह अवार्ड हमें किस इश्यू के लिए मिला है।

-अदिति टंडन, द ट्रिब्यून

सेंसिटिव इश्यू के लिए जरूर निकालें वक्त

अवार्ड मिलने का यह मतलब नहीं कि मुझे अवार्ड मिला है बल्कि यह है कि जिस इश्यू के लिए अवार्ड मिला है, उस इश्यू के लिए भी सोसायटी में गंभीरता और सेंसटिविटी है। एक जर्नलिस्ट के तौर प्रोफेश्निलिज्म के साथ कॉम्पीटिशन का चैलेंज है लेकिन कोशिश यह करनी चाहिए कि बतौर जर्नलिस्ट हम अपनी बीट के साथ ही दूसरे किसी सेंसटिव इश्यू के लिए भी वक्त निकाल सकें। ऐसा करने से सोसायटी में जरूर कहीं न कहीं फर्क पड़ेगा और हम लोगों के पास समाज के लिए कुछ करने का जरिया है।

-गायत्री राजवाड़े, द ट्रिब्यून

रोज की महिलाओं से जुड़ी खबरें

मैंने बतौर पेज थ्री रिपोर्टर अपना करिअर शुरू किया था लेकिन एक रोज मैंने महिलाओं से जुड़ी खबर की। उसके बाद मुझे यह बीट मिल गई। मेरा मानना है कि बीट कोई भी है लेकिन बतौर जर्नलिस्ट अगर हम सोसायटी के इश्यू के लिए सेंसिटिव हैं तो हम समाज के किसी भी इश्यू पर काम कर सकते हैं। मेरा प्रोफेश्नल अनुभव कहता है कि खबरों के बाद असर जरूर होता है क्योंकि मैंने यूपी के शाहजहांपुर में काम किया महिलाओं से जुड़े इश्यू पर, तो वहां पर उसके बाद एनजीओ भी सक्रिय होकर काम करने लगी। कहीं न कहीं हमारे प्रयासों का असर जरूर पड़ता है।

-तरन्नुम अंजुम, इडियन एक्सप्रेस, लखनऊ

सोशल इश्यूज पर जरूर करना चाहिए काम

मैं प्रोफेश्नल अनुभव के मुताबिक कहता है कि अपने प्रोफेशन के साथ हम सोशल इश्यूज पर जरूर काम कर सकते हैं। हम लोगों ने मुंबई में हम लोगों ने प्रयास किया तो उसका काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला। कंपनी के नाते हम लोग अपने क्लाइंट को सोश्ल इश्यूज के लिए कांट्रिब्यूट करने के लिए कह सकते हैं और एप्रोच कर सकते हैं। हमारा मकसद प्रोफेशन के साथ सोशल इश्यूज के लिए लोगों को एजुकेट करना होना चाहिए।

-गरिमा शर्मा, ब्रांड एसोसिएट, लीओ बरनेट





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