शक्षा: तमन्ना पीएचडी की, प्रवेश परीक्षा में फेल
प्रदीप राय
कुरुक्षेत्र परीक्षा में जितने परीक्षार्थी बैठें वे सभी फेल हो जाएं तो स्थिति क्या होगी? परीक्षा देने वाले भी कोई बच्चे नहीं थे, वे सभी पीएचडी करने के इच्छुक थे। इसे परीक्षार्थियों की दयनीय स्थिति कहें या कड़ा कंपीटिशन, लेकिन केयू की पीएचडी प्रवेश परीक्षा का परिणाम कई विषयों में जीरो रहा है। एक ओर जहां योग्य शोधार्थी नहीं मिल रहे हैं, वहीं साइंस में विद्यार्थियों की शोध की रूचि बहुत घट रही है। रिसर्च का भविष्य क्या होगा, चिंता का विषय है।
एक आया, वो भी फेल :
साइंस में कई विषय ऐसे रहे, जहां आवेदक ही ढूंढ़े नहीं मिले। इलेक्ट्रानिक्स साइंस में पीएचडी के लिए एक भी विद्यार्थी ने आवेदन नहीं किया। गणित में स्थिति और भी सोचनीय रही। यहां सिर्फ एक ही आवेदक था, वह भी फेल हो गया।
पीएचडी करने वाले ढूंढ़े नहीं मिलते: भू भौतिकी जैसे विषयों में विद्यार्थियों के पास एमटेक पूरी करने से पहले ही बहुत विकल्प होते हैं। ऐसे में पीएचडी उनकी प्राथमिकताओं में दूर तक नहीं होता। विभाग के डॉ. भगवान सिंह कहते है कि विद्यार्थियों के पास रोजगार के बेहतर अवसर होते हैं, इसलिए एमटेक के बाद कैंपस से लिखने की तत्परता होती है।
मात्र 50 प्रतिशत अंक की कंडीशन:
पीएचडी प्रवेश परीक्षा में सौ-सौ अंक के दो प्रश्न पत्र रखे गए हैं। दोनों प्रश्न पत्र सौ अंक के हैं। प्रत्येक में 50 प्रतिशत अंक हासिल करना जरूरी है।
शिक्षा व्यवस्था में गहन अध्ययन की कमी: पीएचडी में निराशाजनक स्थिति रहने के लिए विशेषज्ञ गहन अध्ययन की कमी को जिम्मेदार मानते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पीजी कक्षाओं में विद्यार्थी चुनिंदा पाठयक्रम पढ़ते हैं जबकि पीएचडी में सिलेबस के आधार पर ही प्रश्न होते हैं, कुछ अलग नहीं। समस्या है तो गहन अध्ययन की। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था उत्तरदायी है। शुरूआत में गहन अध्ययन पर जोर नहीं दिया जाता। बाद में यह समस्या बन जाती है।
रिसर्च एप्टीटयूट की कमी है। पीएचडी के लिए शोध अभिरूचि तो होनी चाहिए
—प्रो. एम.एम. गोयल, विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र विभाग
प्रवेश परीक्षा का निराशाजनक परिणाम चिंता का विषय है। लेकिन क्या करे विषय के गहन अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या बहुत कम है।
—प्रो देवव्रत, विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग