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महंगाई पर काबू ‘बाएं’ हाथ का खेल नहीं

विशेष टिप्पणीसरकार इस वक्त काफी डरी हुई है। इसलिए नहीं कि महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। बल्कि इसलिए कि आम जनता चुप्पी साधे हुए है। सरकारें अपनी प्रजा के बोलने से नहीं डरती, उनके चुप रहने से घबराती हैं। हजारों किसानों द्वारा आत्महत्याएं कर लेने के बाद अपने बजट में साठ हजार करोड़ की ऋण माफी की घोषणा से वाहवाही लूटने वाली सरकार इसलिए परेशान है कि महंगाई की मार उन शहरियों को प्रभावित कर रही है जो साल भर के भीतर दिल्ली के तख्त की तकदीर का अगले पांच वर्र्षो के लिए फैसला करने वाले हैं। राजनीतिज्ञ वस्तुओं की महंगाई से नहीं बल्कि वोटों के बढ़ते भावों से घबराते हैं।

मानसून को लेकर अभी सिर्फ अनुमानों की घोषणा हुई है कि वह सामान्य रहने वाला है। पर यह घोषणा कोई अंतिम सत्य नहीं है। मानसून सामान्य नहीं हुआ तो देश के विकास की वृद्धि की दर क्या होगी, किसी को पता नहीं। हमें पता है कि बारिश के दौरान कई राज्यों में बाढ़ आ जाती है और गांव के गांव डूब जाते हैं। आबादी की आबादी गुम हो जाती है पर बाढ़ के पानी के उतरते ही सबकुछ सामान्य भी हो जाता है। प्रभावित होने वाले लोग और सरकारें दोनों ही सबकुछ भूल जाते हैं। पर दो साल पहले जो पानी मुंबई शहर में घुसा था, वह आने वाले दो सौ सालों तक लोगों को और महाराष्ट्र सरकार को डराता रहेगा। सरकारें शहरों से डरती हैं। विपक्षी दलों को भी चुनाव के ठीक पहले एक बड़ा मौका मिल गया है।

जो दल सत्ता से बाहर हैं, उनकी पूरे समय कोशिश इसी बात को सिद्ध करने की है कि तमाम परेशानियों के लिए सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं। सरकार के पास सिवाय यह कहने कि विपक्षी दल स्थिति का राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं, अपने बचाव में और कोई तर्क नहीं है। किसी भी हुकू मत में जनता से यह कहने की हिम्मत नहीं होती कि बाजार आधारित जिस व्यवस्था पर देश ने चलना तय किया है उसमें कीमतों पर नियंत्रण भी बाजार ही कर सकता है।

उसमें किसी भी तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप का अर्थ आपातकालीन तानाशाही की गुंजाइशें पैदा करने से कम नहीं माना जाएगा। बाजार से बाहर जाकर कीमतों पर नियंत्रण या तो राहतों के खजाने खोलकर या फिर मुद्रा संकुचन के जरिए ही हो सकता है। सरकार दूसरा उपाय कर भी चुकी है और कर भी रही है। पहले उपाय की ओर उसे धकेलने की कोशिश की जा रही है।

दोनों ही उपाय विश्व अर्थव्यवस्था के मिजाज के साथ मेल नहीं खाते। हम लोगों को समझा रहे हैं कि दुनिया के टॉप के दस अमीरों में भारत के कितने लोग अमीर हैं। हम सस्ती कारें बना रहे हैं और मोबाइल फोन के नेटवर्क से पूरे देश को जोड़ना चाह रहे हैं। समृद्धि को लेकर दुनिया भर में प्रचलित मानकों को हमने अपनी आर्थिक प्रगति का हथियार बनाना तय किया है। ऐसे में बाजार के गणित पर राजनीतिक गुणा-भाग से काबू नहीं पाया जा सकता। भारत ही नहीं, दुनिया भर के जिन-जिन देशों की अर्थव्यवस्था में बाजार को स्वतंत्रता प्राप्त है, वहां सरकारें या तो लोगों को संपन्न होते हुए देख सकती हैं या फिर महंगाई और भुखमरी से परेशान होकर लूटपाट करते या आत्महत्याएं करते हुए।

मुक्त अर्थव्यवस्था की वकालत करने वाली सरकारों के लिए संभव नहीं कि शेयर बाजार की संपन्नता को बरकरार रखने के लिए गैर-संपन्न जनता को राहतें बांटना शुरू कर दें। जैसे कोई भी सरकार शेयर बाजार के सेंसेक्स को दैनिक स्तर पर घटा-बढ़ा नहीं सकती, वैसे ही वह चाहकर भी महंगाई पर काबू नहीं पा सकती। बहुत मुमकिन है कि कीमतें और भी बढ़ जाएं और उसके राजनीतिक परिणाम सरकार को भुगतना पड़ें।

पर यह भी सही है कि महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने वाले राजनीतिक दल भी जानते हैं कि इसका उपाय उनके पास भी नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान पर अगर वामपंथी अपने कपड़े फाड़ रहे हैं तो बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं व्यक्त करना चाहिए । ऐसा करना उनकी राजनीतिक मजबूरी है और उसका देश की आर्थिक वास्तविकता से दूर तक का संबंध नहीं है।





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