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13 साल से कागजों में उलझी एक सड़क

ग्वालियर. road सरकारी मशीनरी के कामकाज के तौर-तरीकों के चलते कई महत्वपूर्ण योजनाओं का क्या हश्र होता है, इसकी गवाही देने के लिए ग्वालियर में प्रस्तावित हुरावली रोड के निर्माण की योजना काफी है। प्रदेश सरकार ने 1995 में जो मास्टर प्लान तैयार किया था, उसमें इस सड़क के निर्माण की योजना को शामिल किया गया था। तब से लेकर अब तक सड़क कागजों से निकल कर हकीकत की जमीन पर आकार नहीं ले पायी है।

योजना और उसका मकसद?
ग्वालियर विकास प्राधिकरण की प्रमुख आवासीय एवं व्यावसायिक योजना सिटी सेंटर के अस्तित्व में आने के समय ही शहर में बढ़ते यातायात के दबाव को देखते हुए इसे कम करने की आवश्यकता महसूस की गई।

इसके लिए जरूरी था कि गांधी रोड पर बढ़ते टैेफिक के दबाव को कम करने के लिए वैकल्पिक मार्ग की तलाश की जाये? लिहाजा सिटी सेंटर स्थित राज्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्थान के सामने से होते हुए कुलपति निवास के करीब से हुरावली पुल तक सड़क बनाने की योजना तैयार कर मास्टर प्लान में शामिल कर ली गई।

चार साल पहले हुआ नोटिफिकेशन
सड़क निर्माण की योजना को संशोधन के साथ स्वीकार करते हुए राज्य शासन ने 10 अगस्त 2004 को इसे गजट में भी प्रकाशित कर दिया। तीस मीटर चौड़ी इस सड़क के लिए टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग विभाग ने सर्वे कराया और प्लान तैयार कर भूमि के उन तमाम सर्वे नम्बरों की सूचना भी जारी कर दी, जो सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहीत की जानी थी।

बस, यहीं पर लग गया ब्रेक
टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग ने जैसे ही सड़क निर्माण के अंतर्गत आने वाली जमीन के सर्वे नम्बरों का खुलासा किया, वैसे ही योजना के रफ्तार पकड़ने की जगह ब्रेक लग गये। इसकी वजह उन लोगों का सक्रिय हो जाना रहा, जिनकी जमीन घोषित किये गये सर्वे नम्बरों में दर्ज है।

यहां इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि जमीन मालिकों की सक्रियता के पीछे कहीं न कहीं सरकारी एजेंसियों और योजना को क्रियान्वित करने वाले अफसरों की दिलचस्पी भी रही होगी?

जीडीए से नगर निगम तक
सड़क निर्माण की योजना जब बनी तो सबसे पहले ग्वालियर विकास प्राधिकरण ने खुद इसके निर्माण में दिलचस्पी दिखाई, वजह क्या रही, यह तो वही जाने पर बाद में उसने अपना इरादा बदल दिया और सड़क निर्माण का जिम्मा नगर निगम पर आ गया। शासन ने नगर निगम को योजना पर अमल के लिए एक करोड़ रुपए की राशि भी स्वीकृत कर दी है। अब जीडीए को एक करोड़ 60 लाख रुपए की राशि नगर निगम को देना है।

टेंडर हुए पर काम नहीं
नगर निगम ने दो माह पहले ही सड़क निर्माण के लिए टेंडर कर दिये हैं पर वह काम शुरू नहीं करा पाया है। वजह तलाशने पर पता चला कि ठेकेदार को जिस जमीन पर सड़क बनानी है, उसका अभी तक अधिग्रहण ही नहीं हो पाया है।

अब बिना जमीन के सड़क का निर्माण कहां और कैसे हो, यह सवाल लिए ठेकेदार हाथ पर हाथ धरे बैठा है। सरकारी व्यवस्था को ही मानकर चलें तो दो माह माह बाद बरसात का सीजन शुरू हो जायेगा और फिर चार महीने के लिए निर्माण कार्य बंद कर दिये जायेंगे। ऐसे में तय है कि सड़क का निर्माण इस वर्ष हो पायेगा, इसमें संदेह है?

आखिर कौन है जिम्मेदार ?
शहर के विकास की एक महत्वपूर्ण योजना को इस हाल में पहुंचाने के लिए आखिरकार कौन लोग जिम्मेदार हैं? सरकारी अफसरों से लेकर उससे जुड़ी एजेंसियों की इसमें क्या भूमिका है, इन सवालों का सीधा जवाब देने की स्थिति में कोई नहीं है।

योजना के काम की कछुआ चाल को लेकर शख्स का बयान टालमटोल वाला है, मतलब यह कि हर छोटी-बड़ी उपलब्धि का श्रेय खुद आगे बढ़कर लेने वाले नेताओं से लेकर योजनाओं की सफलता की वाहवाही लूटने वाले अफसर तक इस योजना के मामले में खुद का पल्ला झाड़ने और जिम्मेदारी दूसरे पर डालने की कोशिश में लगे नजर आते हैं?





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