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व्यक्ति ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्य निभाए

जीवन दर्शन. मेरा नगर उदयपुरा, रायसेन जो उस समय एक छोटा सा गांव था। तब इस गांव के शासकीय कन्या विद्यालय को एक आदर्श एवं प्रतिभासंपन्न शिक्षिका का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इस आदर्श शिक्षिका का नाम था श्रीमती गायत्री श्रीवास्तव। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक उतार-चढ़ाव देखे, कई विषम परिस्थितियों से उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

शादी के कुछ समय बाद ही विधवा हो जाने का अभिशाप सहने के बाद भी अपने जीवन को पुनस्र्थापित करने में पूर्ण मनोयोग से अपनी शैक्षणिक योग्यता को निरंतर बढ़ाते हुए अपने श्वसुर के सद्प्रयासों से उदयपुरा से लगभग 6 किमी दूर स्थित नर्मदातटीय ग्राम बौरास में सहायक शिक्षिका के रूप में नियुक्ति पाई। वर्ष 1956 से अध्यापन कार्य से जुड़ने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

माताजी की शिक्षिका के पद पर नियुक्ति के समय मैं करीब एक-डेढ़ वर्ष का रहा होऊंगा। मुझे अपने स्व. पिताजी की सूरत का अंदाजा उनकी फोटो देखकर ही होता है। मेरा पालन-पोषण एवं सभी घरेलू दायित्व निबटाने के बाद अध्यापन कार्य को एक मिशन समझकर पूर्ण निष्ठा एवं ईमानदारी से निशुल्क शिक्षा-दान किया। विद्यालय परिवार में गायत्री बहिनजी के नाम से विख्यात उन्होंने अपने अधिकाधिक समय को विद्यालयीन गतिविधियों के लिए समर्पित किया। वर्ष 1956 से एक सहायक शिक्षिका के रूप में शिक्षण कार्य से जुड़ने के बाद उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें व्याख्याता के पद पर पदोन्नत किया गया।

गायत्री बहिनजी के पढ़ाए हुए छात्र-छात्राएं ऊंचे-ऊंचे पदों पर हैं। सन् 1985 में उन्हें ब्रेन ट्यूमर जैसे घातक रोग का शिकार होना पड़ा। ब्रेन ट्यूमर के इलाज के लिए मैं उन्हें भोपाल लाया, किंतु डॉक्टरों ने उन्हें ग्वालियर रेफर कर दिया।

मैं, मेरी पत्नी जो उस समय गर्भवती थी तथा दो पुत्रों सहित पहली बार ग्वालियर माता जी को लेकर गया, जहां मेरा कोई परिचित नहीं था, लेकिन मां की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के फलस्वरूप उनकी एक पुरानी शिष्या ने मुझे सड़क से गुजरते देख लिया, उन्होंने फौरन मुझे आवाज देकर रोका और सारा हाल जानकर मेरे पूरे परिवार को घर ले जाकर लगभग एक माह जब तक कि मां का ट्यूमर का सफल ऑपरेशन नहीं हो गया, रखा।

ईश्वर ने उन्हें नई जिंदगी प्रदान की। उसके बाद मां ने सन1993 तक शारीरिक रूप से कमजोर होने के बावजूद पूरी निष्ठा व ईमानदारी से विद्यार्थियों को शिक्षा दान दिया। वर्ष 1998 में उन्होंने यह संसार छोड़ दिया। ऐसी आदर्शवान शिक्षिका का एकमात्र पुत्र होने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ।





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