दृष्टिकोण.
चीन के आम आदमी का कद वैश्विक तुलना में काफी छोटा है, किंतु ‘साम्यवादी’ चीन की आश्चर्यजनक प्रगति इस बात का प्रमाण है कि इस छोटे से (लेकिन जीवटता भरे) आदमी की सोच, कार्यक्षमता और आगे बढ़ने की ललक कितनी विशाल है। कम्युनिस्ट चीन बदल रहा है, साम्यवाद की पुरानी चिर-परिचित परिभाष से कुछ वर्षो से दूरी बना रहा है और वहां का बांस का पर्दा कुछ झीना हो चला है।
ये बातें वष्रो से सुनने-पढ़ने को मिल रही थीं लेकिन चीन ने तियनानमेन चौक की त्रासदी को भुलाकर विश्व स्तर पर अपनी जो ठोस पहचान और स्वीकार्यता बनाई है, यह देखने पर ही विश्वास होता है। आम भारतीय के मन में जो चित्र है उससे आज का चीन कहीं ज्यादा बदला हुआ है।
बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं, एक से बढ़कर एक कीमती-आधुनिक गाड़ियां, बेहद साफ-सुथरे और व्यवस्थित झुग्गीमुक्त शहर, चमचमाती-चिकनी सड़कें, भव्य बगीचे, हरियाली, विशाल एयरपोर्ट्स, अविश्वसनीय आकार के सेज, शंघाई की 430 किलोमीटर प्रतिघंटा चलने वाली (उड़ने वाली?) ट्रेन।
यह सब चीन को किसी भी यूरोपीय देश या अमेरिका से आगे ले जाता है। बीजिंग हो या शंघाई, वुशी हो या चोंगक्ंिवग, चीन जबरदस्त प्रगति की राह पर है जिसकी कल्पना करना भी वहां जाने के पूर्व मेरे लिए मुश्किल था। लंदन, न्यूयॉर्क, मेलबोर्न, बर्लिन, वॉशिंगटन, ऑकलैंड इन जैसे किसी भी विकसित और आधुनिक शहरों को देखने के बाद मैं यह कहने की स्थिति में हूं कि चीन के नए शहर इनमें से किसी भी शहर को बराबरी से टक्कर दे रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक आर्थिक महासत्ता के रूप में चीन का नाम शायद ही कोई लेता था।
मगर, मजाक में यह जरूर कहा जाता था कि वहां एक शेर सो रहा है, उसे न जगाएं। मजदूरों और किसानों से भरे पड़े इस देश ने दुनिया को दिखा दिया है कि अनुशासन, कर्मठता, नया करने की जिजीविष और अपनी विचारधारा को बोझ माने बगैर वैश्विक बदलाव को आत्मसात कर पूंजीवादी देशों के साथ कैसे खड़ा रहा जा सकता है। शेर अब न सिर्फ जाग गया है, बल्कि दहाड़ रहा है और दुनिया उसे डरी-सहमी निहार रही है। चीन का समाज अब खुला-खुला है। यहां के होटल, रेस्त्रां और विशालकाय शॉपिंग मॉल्स में पश्चिम के आधुनिक वातावरण की पूरी छाप है।
लड़कियां अकेले घूमती हैं और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलती हैं। आज चीन 11-12 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद विकास दर (जीडीपी ग्रोथ) दर्ज कर रहा है, ग्रामीण चीनियों की आय में 15 प्रतिशत वृद्धि हुई है और शहरी बेरोजगारी सिर्फ 4 प्रतिशत है। विदेश व्यापार पिछले वर्ष 23 प्रतिशत की दर से बढ़ा और विदेशी विनिमय की वृद्धि 43 प्रतिशत रही।
यह सब उस देश में हो रहा है जिसे अपनी जनसंख्या के बोझ, कट्टर विचारधारा और आंतरिक विरोधाभासों के चलते एशिया में भी औद्योगिक सत्ता के रूप में नहीं देखा (यहां जापान कभी आगे रहा था) गया। भारत की आजादी के दो वर्ष बाद (अक्टूबर 1949) ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चायना’ स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया पर अपनी ही समस्याओं से जूझता रहा। वैसे ही, जैसे भारत में लोकतंत्र की अपनी परेशानियां थीं।
आज का चीन समस्याओं से मुक्त नहीं है। प्रदूषण और भ्रष्टाचार वहां भी है, भिखारी देखने को मिलेंगे लेकिन झुग्गियां नहीं। स्थानीय अखबार बढ़ती और खुली वेश्यावृत्ति के बारे में लिख रहे हैं। भयावह आबादी के बावजूद विकास का जो मॉडल चीन ने पेश किया है वह भारतीय संदर्भो में तो निश्चित रूप से स्वप्न ही है।
बीजिंग में ओलिंपिक और 2010 में शंघाई में होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय एक्सपो की तैयारियों की गति आश्चर्यजनक रूप से सुखद है। वैसे तो पूरे ही चीन में निर्माण कार्यों की गति, गुणवत्ता, आकार और नवीनता विश्व स्तर की है लेकिन शंघाई का ओरिएंटल पर्ल टॉवर, वहां की मॅगलेव ट्रेन (चुंबकीय), बीजिंग में बन रहा ओलिंपिक स्टेडियम, वुशी एसईझेड का सारा क्षेत्र अकल्पनीय है। शंघाई एयरपोर्ट पर 300 के लगभग उड़ानें प्रतिदिन आती-जाती हैं। पुडांग एयरपोर्ट तो एक वास्तुशिल्प का अजूबा है। हमारे किसी भी एयरपोर्ट की तुलना इससे नहीं हो सकती।
चीन यानी सिर्फ बीजिंग और शंघाई ही नहीं हैं। दक्षिण पश्चिमी चीन की सिर्फ 11 वर्ष पुरानी म्युनिसिपैलिटी चोंगक्विंग के बारे में कहा जा रहा है यह ‘छोटा शहर’ (सीचुहान जिले से 1997 में अलग हुआ था) अपनी शहरीकरण की गति में विश्व का सबसे तेज बढ़ता शहर है जहां तीन करोड़ से अधिक लोग रह रहे हैं और 2020 तक एक करोड़ किसान तथा खेतिहर मजदूर और आने वाले हैं।
वहां के अधिकारी छाती ठोककर कहते हैं कि अगले 10 वर्षो की शिक्षा, रहवास, पेंशन और स्वच्छता की सारी तैयारियां हो चुकी हैं जिससे लाखों नए लोग जो चोंगक्विंग के नए शहर में बसेंगे उन्हें दिक्कतें न हों। वे यह भी दावा करते हैं कि ब्राजील और भारत के शहरों जैसी झुग्गियां चोंगक्विंग में नहीं दिखेंगी।
आप सहज कल्पना कर सकते हैं कि नगर नियोजन के कानून कितने व्यवस्थित होंगे कि एक दशक से कम समय में हर जरूरी व्यवस्था से भरपूर नए और बड़े शहर बनकर तैयार हो जाते हैं। चीन में लोग सड़कों पर थूकते, पेशाब करते या अन्य गंदगी फैलाते नहीं दिखते। जबकि ऐसे दृश्य भारत में आम हैं।
वुशी प्रॉविंस विशालकाय सुंदर तालाब ताईहू के किनारे बसा नया जिला है। फोब्र्स-500 सूची की कई विश्व स्तरीय कंपनियों का गढ़ है जो यहां बड़े-बड़े कारखाने लगा चुकी हैं अर्थात् कर प्रणाली, जमीन देने की नीतियां, बिजली, मजदूरों की समस्याएं आदि को सरकार ने पहले ही निपटा दिया है।
औद्योगिकीकरण के साथ-साथ चीन में पर्यावरण संतुलन भी देखने को मिलता है। लाखों वृक्षों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर वैज्ञानिक एवं संवेदनशील तरीके से पुन:रोपित करने का काम चीन में हर स्थान पर दिखता है। बीजिंग को 2001 में जब ओलिंपिक आयोजित करने का फैसला मिला तब वहां प्रदूषण का स्तर काफी था जिसे अब काफी हद तक कम कर लिया गया है। वह भी बगैर किसी सर्वोच्च न्यायालय के दखल या सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता नारायण के।
धूल रहित सड़कों पर कई-कई लेन और ढेरों फ्लाईओवर, लगातार बढ़ रहे वाहनों पर नया कर, एक ही व्यक्ति के दूसरे वाहन के रजिस्ट्रेशन की बढ़ी हुई फीस, सम-विषम नंबर की गाड़ियों के सड़क पर चलने के दिनों का निर्धारण आदि प्रयास सड़क यातायात को सुगम करने हेतु चल रहे हैं।
हमारे यहां कोलकाता या मुंबई, पुणो या इंदौर सरीखे शहरों के क्या हालात हैं? नित नई टेक्नोलॉजी का उपयोग, अपने काम में गजब की मेहनत, लगन, सार्वजनिक अनुशासन और देश प्रेम के जरिए, लोकतंत्र की बुराइयों से बचा हुआ यह नास्तिक देश भूमंडलीकरण के दौर में अब सारी दुनिया के लोगों का आत्मीय स्वागत करता दिख रहा है।