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पुण्य-पावन नदियों पर टिकी है हमारी पहचान

देश के दक्षिणी छोर पर कन्याकुमारी के निकट रहने वाला सुकुमार कार्तिकेयन अपने खेतों में नारियल उगाता है। हिमाचल प्रदेश में रहने वाला सीताराम पांडे पेशे से गाइड है और पर्यटकों को पहाड़ों की सैर करवाता है। अलग-अलग छोरों पर बसे इन दो इलाकों के बीच भारत के लाखों गांव, कस्बे और शहर-महानगर हैं, जिनमें एक अरब से भी ज्यादा लोग बसते हैं। भारत की इस विशाल आबादी में द्रविड़ों, आर्र्यो, मंगोलों और अफ्रीकी समेत कई प्रजातियों का संगम है। यहां के लोग अलग-अलग धर्र्मो और संप्रदायों को मानने वाले हैं। उनका रूप-रंग, चेहरा-मोहरा और शारीरिक बनावट अलग-अलग होती है। यहां सामुदायिक आधार पर हजारों तरह की बोलियां बोली जाती हैं और 35 मुख्य भाषाएं हैं।

लोगों का खान-पान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके क्षेत्र में क्या उगता है या क्या उपलब्ध है। मसलन भारत के समुद्रतटीय इलाकों के लोग नारियल मिश्रित करी और चावल खाते हैं, तो उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में लोग ज्यादातर दालें, सब्जियां, चपाती और चावल खाकर गुजारा करते हैं। यहां के लोगों का पारिवारिक ढांचा, वैवाहिक संबंध, शैक्षणिक स्तर और सांस्कृतिक जड़ें कई रूपों में कभी-कभार तो एक-दूसरे के प्रतिकूल होती हैं। उनका अपना अलग साहित्य और संगीत होता है।

यहां तक कि उनके लोकनृत्यों और संगीत में भी काफी विविधता होती है। जैसा कि डॉ. अमत्र्य सेन ने अपनी किताब ‘द आग्यरुमेंटेटिव इंडियन’ में कहा है, ‘भारत अलग-अलग पेशों, बिलकुल अलग-अलग मान्यताओं, पूरी तरह जुदा परंपराओं और यथार्थवादी सोच के साथ असीम विविधताओं वाला देश है।’ यह तय करना बहुत मुश्किल है कि इन सब मान्यताओं और जीवन जीने के तरीकों को कौन एक साथ जोड़ता है, जो ये विविध समुदाय एक राष्ट्र के तौर पर साथ रहते हैं।

आखिर इस ‘भाईचारे’ के पीछे कौन सा रहस्य छिपा है? हम अपनी कलकल बहती नदियों की विशेषताओं, दंतकथाओं और हमारी सभ्यता, इतिहास, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और कला के विकास में उनकी भूमिका पर एक निगाह डालें, तो संभवत: हमें अपने सवाल का जवाब मिल जाएगा। भारत में कई नदियां बहती हैं जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक हर क्षेत्र से गुजरती हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण गंगा-यमुना समूह अपनी असंख्य सहायक नदियों के साथ है, जिनका बंगाल की खाड़ी तक जबरदस्त प्रभाव है।

इसके अलावा उत्तर में सिंधु पांच विख्यात सहायक नदियों(झेलम, रावी, सतलुज, व्यास और चेनाब) के साथ पाकिस्तान में बहती है, यद्यपि पंजाब, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों पर अभी भी इसकी संस्कृति का काफी प्रभाव है। प्रायद्वीप में नीचे की ओर नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी जैसी नदियां विंध्य और सह्याद्रि पर्वतमालाओं से छोटी-छोटी सहायक नदियों के साथ मिलकर अलग तंत्र बनाती हैं।

भारत की संस्कृति और सभ्यता को संवारने में ही गंगा का योगदान नहीं है, वरन इस पावन नदी ने कंबोडिया, श्रीलंका, इंडोनेशिया, जापान समेत समस्त पूर्वी देशों की संस्कृतियों पर भी जबरदस्त प्रभाव डाला है। भारत का बच्च-बच्च इस दंतकथा से परिचित है कि गंगा का अवतरण मोक्षदायिनी के तौर पर हुआ है। भारत के दो महाग्रंथों में इसका उल्लेख है और देश की अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका को भी स्वीकार किया जाता है।

यमुना को हमेशा से राधा-कृष्ण की रासलीलाओं के साथ जोड़ा जाता है। पारंपरिक तौर पर यमुना कृष्ण की महारानी हैं और विश्व के सभी कृष्ण प्रेमियों की यह चहेती नदी है। हाल के वर्र्षो में नर्मदा नदी राजनीतिक कारणों के चलते चर्चा में रही है। लेकिन ऐतिहासिक तौर पर उसे मां की तरह पूजा जाता रहा है। ऐसी नदी जो साहित्य, कला और आध्यात्मिक कामों की प्रेरणा बनी। उसका समीपवर्ती क्षेत्र खेती के लिए काफी उपजाऊ है और इसके तट पर मांडू, महेश्वर और इंदौर जैसे कई बेहतरीन ऐतिहासिक शहर बसे हैं। रामायण में गोदावरी का कई बार जिक्र आया है कि राम, लक्ष्मण और सीता ने अपने चौदह वर्ष के वनवास के दौरान काफी समय इसके तट पर गुजारा। कृष्णा नदी के तट पर हंपी के विजयनगर साम्राज्य के संस्थापकों और छत्रपति शिवाजी द्वारा आजादी की कई लड़ाइयां लड़ी गईं। कावेरी नदी आदि शंकराचार्य समेत देश के कई महान संतों का गढ़ रही है।

भारत के मैदानी इलाकों को सिंचित करने व देश की कृषि का मुख्य आसरा होने के अलावा इन नदियों ने हमें हमारी नागरिक सभ्यताजनित पहचान, संस्कृति, संगीत, नृत्य, वास्तुशिल्प और आत्मछवि दी है। हमारे राष्ट्रीय चित्त में इसकी मौजूदगी ऐसा बंध है जो हमें एक व्यक्ति-एक राष्ट्र के तौर पर जोड़ता है। इसलिए हम भारतीयों को इनके ऋण के उपादान में इनकी शुद्धता और पवित्रता को अक्षुण्ण रखना चाहिए। हम सभी को इनके स्वच्छ और लबालब स्वरूप को बरकरार रखने की दिशा में काम करना होगा, चूंकि ये हमारे जीवन का स्रोत तथा हमारी राष्ट्रीयता की प्रतीक हैं।

-लेखिका फेमिना की पूर्व संपादक हैं।





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