छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लेकर हुए बवाल के बाद केंद्र सरकार ने इसकी समीक्षा के लिए सचिवों की एक समिति बनाने का फैसला किया है। भारतीय पुलिस सेवा एवं सेना के अधिकारियों में इसको लेकर काफी आक्रोश है। उनका आरोप है कि सिफारिशें सरकारी सेवाओं के अंदर एक तरह के जातिवाद को स्थापित करने वाली हैं, जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवा को ब्राrाण की तरह सर्वोच्च स्थान दिया गया है। कई केंद्रीय मंत्रियों का भी मानना है कि इससे विषमता बढ़ेगी, क्योंकि ऊपर और नीचे के मुलाजिमों के लिए प्रस्तावित बढ़ोतरी में काफी फर्क है।
सबसे बड़ी चुनौती ही विषमता को पाटने की है। सरकारी मुलाजिमों का वेतन आम आदमी की आमदनी के मद्देनजर निर्धारित किया जाना चाहिए और जोर कार्यक्षमता बढ़ाने एवं भ्रष्टाचार घटाने पर होना चाहिए। एक बात जो बराबर उठती है वह है निजी क्षेत्रों से सार्वजनिक क्षेत्रों के वेतनमानों की तुलना, जिसे आयोग ने खारिज कर दिया है। दरअसल, एक आय नीति बनाने की आवश्यकता है।
निजी क्षेत्रों में बड़े अधिकारियों को इतनी तनख्वाह मिल रही है जिससे विषमता बढ़ती जा रही है परंतु जो कंपनियां सीईओ को करोड़ों का पैकेज दे रही हैं वही छोटे कर्मचारियों को बहुत ही मामूली वेतन देती हैं। गत वर्ष जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने निजी क्षेत्रों को अपने मुख्य कार्यकारी तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के वेतनों में कटौती करने का सुझाव दिया था, तो हंगामा खड़ा हो गया कि क्या प्रधानमंत्री को ऐसी सलाह देने का हक है? परंतु प्रधानमंत्री ने बहुत उचित सुझाव दिया था। निजी क्षेत्र में वेतन संरचना को अधिक तर्कसंगत बनाने की जरूरत है।
जहां तक सरकारी नौकरी का सवाल है शुरू से इसका अर्थ रहा है बिना जवाबदेही के सुरक्षा के साथ ओहदा। चूंकि अंग्रेज भारत पर शासन करने आए थे, इसलिए उन्होंने प्रशासन का एक भारी भरकम ढांचा खड़ा किया। 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट में ईस्ट इंडिया कंपनी एवं सम्राट के बीच भागीदारी की अवधारणा स्थापित की गई। भारत के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा संविधान बनाने की दिशा में यह अधिनियम पहला कदम था।
इसके अंतर्गत बंगाल में एक सुप्रीम कॉउंसिल की स्थापना की गई जिसमें एक गवर्नर जनरल तथा तीन काउंसलर थे। गवर्नर जनरल की तनख्वाह 25 हजार पाउंड तथा पार्षद की 10 हजार पाउंड प्रतिवर्ष तय की गई। भारत जैसे गरीब देश में यह वीभत्स था। कोई आश्चर्य नहीं कि उसके लगभग 150 वर्ष बाद महात्मा गांधी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को 2 मार्च 1930 को लिखे अपने पत्र में लिखा है कि वह ब्रिटिश हुकूमत को अभिशाप मानते हैं जिसने बढ़ते शोषण एवं विनाशकारी खर्चीले सैन्य तथा नागरिक प्रशासन के द्वारा करोड़ों गूंगी जनता को निर्धन बनाया है।
स्वाधीनता के बाद भी स्थापना पर खर्च इतना अधिक है कि विकास के लिए मुश्किल से धन बचता है। यहीं पर आम आदमी पिसता है। अजरुन सेन गुप्त की अध्यक्षता वाली असंगठित क्षेत्रों पर बनी समिति की रिपोर्ट के अनुसार 77 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन 20 रुपए या उससे भी कम पर गुजारा कर रही है। सरकार का सबसे बड़ा दायित्व है इस विषमता को कम कर प्रतिव्यक्ति आय को बढ़ाना। आजादी के पहले से ही प्रतिव्यक्ति आय बढ़ाना हमारे राष्ट्रीय नेताओं के एजेंडे पर सबसे ऊपर था।
दूसरे विश्व युद्ध के समापन के निकट योजना भारतीय चिंतन के केंद्र में आ गई। 1944 में देश के चर्चित उद्योगपतियों द्वारा भारत के आर्थिक विकास के लिए तैयार की गई एक योजना का प्रकाशन हुआ। बांबे प्लान के नाम से मशहूर इस योजना में तीन पंचवर्षीय चरणों में 10 हजार करोड़ रुपए निवेश करने का सुझाव था ताकि अर्थव्यवस्था एवं लोगों के जीवन स्तर को सुधारा जा सके। उनका अनुमान था कि न्यूनतम जीवन स्तर प्राप्त करने के लिए युद्ध के पहले की कीमतों पर 74 रुपए प्रतिव्यक्ति आय तक पहुंचना आवश्यक था। उस समय यह 65 रुपए थी और 74 रुपए का लक्ष्य भी बहुत दूर दिखता था।
कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाना कुशलता तथा ईमानदारी की कोई गारंटी नहीं है। पांचवें वेतन आयोग ने वाहन भत्ता दिया जिसे छठे आयोग ने बढ़ाने की सिफारिश की है। हकीकत यह है कि अधिकारी यह भत्ता भी लेते हैं और सरकारी गाड़ी से दफ्तर आते-जाते हैं। निगरानी विभाग भी इसको मामूली भ्रष्टाचार मानता है। नौकरशाह को कभी भी काम नहीं करने या अक्षमता के लिए दंडित नहीं किया जाता है। भ्रष्टाचार के लिए कभी-कभार किसी को सजा मिल जाती है। सरकारें आती-जाती हैं लेकिन नौकरशाह बने रहते हैं और बिना समर्पण के कार्य करते हैं।
महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां हर काल के लिए सही हैं ‘शांति नहीं तब तक जब तक/सहभाग न नर का सम हो, नहीं किसी को बहुत अधिक हो/नहीं किसी को कम हो।’ विषमता यदि अधिक होगी, तो हिंसा को रोका नहीं जा सकेगा।
-लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।