विकास मंत्र. यह बात उस समय की है जब नेल्सन मंडेला जवाहरलाल नेहरू सम्मान लेने के लिए भारत आए थे और राष्ट्रपति भवन में ठहरे हुए थे। तब तक उनका देश दक्षिण अफ्रीका नस्लवादी सरकार की गुलामी से आजाद हो चुका था, जिसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत, सबसे ऊर्जावान और सबसे कीमती 29 वर्ष सींखचों के पीछे गुजार दिए थे।
सुबह जब मैं उनसे मिला तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं उन्हीं से मिल रहा हूं, क्योंकि उस समय वे छींटदार प्रिंट की हॉफ शर्ट और बरमुडा पहने हुए लॉन में सैर कर रहे थे। खैर, मेरे लिए यह एक सपने के साकार होने जैसा था। मैंने उनसे पूछा, ‘महामहिम, आखिर वह कौन सी शक्ति थी, जिसके सहारे आपने अपनी जिंदगी के 29 वर्ष कैदखाने में गुजार दिए और आप टूटे नहीं?’ उन्होंेने अपने फौलादी सांवले चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान लाते हुए कहा था ‘बस यही कि मैंने अपने निर्णय पर कभी अफसोस नहीं किया।’
सच में, कैसे हमारे दिमाग की छोटी-छोटी बातें और उसके छोटे-छोटे तौर-तरीके हमारी जिंदगियों के बड़े-बड़े और विलक्षण कामों के आधार बन जाते हैं। इस सचाई को नेल्सन मंडेला की इस आत्म-उक्ति में देखा जा सकता है। साथ ही इस कथन से यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि हमारी जो सबसे बड़ी ताकत होती है वह सत्ता, धन और शरीर की नहीं, बल्कि मस्तिष्क की होती है, मन की होती है, विचारों की होती है। मंडेलाजी के इस उत्तर का तीसरा किंतु बड़ा संदेश मुझे यह मिला कि यदि एक बार फैसला कर लिया है, तो बस कर लिया है। उस पर डटे रहो। उसको आसानी से बदलो मत। रणनीति को भले ही बदल दो, लेकिन उद्देश्य को नहीं।
-लेखक समय एवं जीवन प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं।