दृष्टिकोण. भारत सरकार की हवेली में कई कमरे और अनेकानेक कमेटियां हैं। इन कमेटियों को कुछ विशेष समस्याओं पर विचार करने, रिपोर्ट सौंपने और इसके बाद गुमनामी में खो जाने के लिए गठित किया जाता है। कुछ हद तक ये रिपोट्र्स तब तक सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में पड़े-पड़े धूल खाती रहती हैं, जब तक कि कोई दूसरी कमेटी इसी या ऐसे ही किसी मसले पर विचार करने के लिए गठित नहीं की जाती। यह एक अलिखित नियम है कि किसी भी कमेटी की रिपोर्ट की शुरुआत इस विषय पर पहले बनाई गई सभी कमेटियों की समस्त रिपोट्र्स की फेहरिस्त तैयार करने से होनी चाहिए।
ज्यादातर कमेटियों की रिपोट्र्स इस मायने में एक जैसी होती हैं कि उनके निष्कर्ष और अनुशंसाओं पर कमेटी के सभी सदस्य सहमत होते हैं, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता। कई बार इसके एक-दो या इससे ज्यादा सदस्य स्वविवेक के आधार पर रिपोर्ट में कही गई बातों के साथ खुद को असहज पाते हैं। ऐसे में यदि अध्यक्ष मतभेद सुलझाने में असफल रहा और उसने एकमत रिपोर्ट सौंप दी, तो असहमत सदस्य अपनी स्थिति साफ करते हुए अलग से एक नोट या रिपोर्ट लिख सकता है। अक्सर ऐसा होता है कि ऐसे असहमति नोट की ड्राफ्टिंग काफी श्रमसाध्य हो जाती है। इतनी मुश्किल किसी रिपोर्ट पर सहमति जताने वाले को नहीं होती।
ऐसे कई मामले हैं जहां एक से ज्यादा सदस्यों ने असहमति पत्र तैयार किए। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट की बेंचों के निर्णयों में होता है, बहुमत रिपोर्ट को कमेटी की अनुशंसाओं का मुख्य निकाय माना जाता है। इस हफ्ते कमेटियों की रिपोट्र्स के संदर्भ में कुछ अनूठी बात हुई। कृषि उत्पादों के संदर्भ में वायदा बाजारों की कार्यशैली का अध्ययन करने के लिए मार्च 2007 में योजना आयोग के सदस्य प्रोफेसर अभिजीत सेन की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई।
28 फरवरी 2007 को वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने अपने बजट भाषण के दौरान गेहूं और धान के वायदा कारोबार पर रोक लगाने की घोषणा की। इसके पहले वायदा बाजार आयोग ने इसी तरह तुअर और अरहर की लगातार बढ़ती कीमतों के चलते इनके कारोबार पर भी रोक लगा दी थी। सेन कमेटी को अपनी रिपोर्ट दो महीने के भीतर सौंपनी थी। निर्धारित समय पूरा होने पर अध्यक्ष ने इसके कार्यकाल को बढ़ाने की गुजारिश की, जिसे मान लिया गया। इस कमेटी को बने 14 महीने होने को आए, लेकिन कार्यकाल बढ़ाने के आवेदनों और मंजूरी का क्रम चलता रहा।
21 मार्च 2006 को लोकसभा में 1952 अधिनियम को संशोधित करते हुए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एमेंडमेंट बिल, 2006 पेश किया गया। संबंद्ध संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए कृषि जिंसों के वायदा कारोबार को फिर से शुरू करने पर विरोध जताया था। भारत सरकार ने इस 2006 अधिनियम के प्रावधानों को कायम रखने के लिए एक अध्यादेश जारी कर दिया। संसद के मौजूदा सत्र में यह अध्यादेश समाप्त हो रहा है। इस बिल पर संसद में बहस होने से पहले सेन कमेटी की रिपोर्ट सरकार और संसद सदस्यों के लिए उपलब्ध होनी जरूरी थी।
हाल के वर्षो में इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से वायदा कारोबार का आकार कई गुना बढ़ गया। वर्ष 2001-02 में जहां 27,308 करोड़ रुपए का वायदा कारोबार हुआ, वहीं 2006-07 में यह बढ़ते-बढ़ते 21,34,471 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। 2007-08 के दौरान इस बात को लेकर राजनीतिक विवाद होते रहे कि कहीं बढ़ती मुद्रास्फीति का कारण वायदा बाजार की कार्यशैली तो नहीं है। जब मुद्रास्फीति की दर हफ्ते दर हफ्ते बढ़ते हुए 7.41 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई, तो सभी विपक्षी पार्टियों और खासकर सहयोगी वाम दलों ने सरकार पर सीधा हमला करते हुए सभी जरूरी कृषि जिंसों के वायदा कारोबार पर रोक लगाने को लेकर हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी।
आखिरकार, 17 अप्रैल 2008 को केंद्रीय कृषि मंत्री ने राज्यसभा में घोषणा की कि यदि अभिजीत सेन की कमेटी ने दस दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की, तो उन्हें मजबूरन इस विषय के विशेषज्ञों की एक मीटिंग बुलाते हुए यह फैसला करना होगा कि वायदा कारोबार को जारी रखने की इजाजत दी जाए या नहीं। यह कमेटी को जल्द से जल्द रिपोर्ट पेश करने का साफ संकेत था और उसने पिछले हफ्ते किसी तरह इसे पेश कर दिया।
यहीं यह अनूठी घटना घटी। यह सर्वसम्मत रिपोर्ट नहीं है। ऐसा लगता है कि कमेटी के सदस्यों को निश्चित तौर पर यही समझ में नहीं आया कि इसके गठन का मूल उद्देश्य क्या था। जैसा कि ज्यादातर सदस्यों की राय से लगता है कि इस समिति का उद्देश्य केवल वायदा बाजार की कार्यशैली का थोक और खुदरा कृषि मूल्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने तक सीमित था और इससे इसमें पिछले साल के दौरान वायदा कारोबार से हटाए गए उत्पादों को फिर से शामिल करने या न करने के बारे में किसी टिप्पणी की अपेक्षा नहीं की गई थी।
कमेटी को ऐसी रिपोर्ट सौंपना ही बुद्धिमत्तापूर्ण लगा जिसे ‘न्यूनतम साझा रिपोर्ट’ कहा जा सकता है और इसके सीमित दायरे में उन्हीं बिंदुओं को उठाया गया जिन पर सभी सदस्यों की सहमति रही। हालांकि इसके अध्यक्ष डॉ. सेन, जो अपने वामपंथी रुझान के लिए जाने जाते हैं, खुद इससे सहमत नजर नहीं आते, इसीलिए उन्हें लगा कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सरकार को वायदा बाजार को मंजूरी देने से जुड़े जोखिम के बारे में सावधान कर सकते हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमतें आसमान छू रही हैं।
स्पष्ट है कि वे घरेलू कृषि बाजार को वैश्विक बाजार से संरक्षित करने की नीति के पक्षधर हैं, चाहे इसके लिए रियायत, आयात, निर्यात प्रतिबंध और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कृषि उत्पादों के यातायात, भंडारण, व्यापार और प्रसंस्करण को सीमित करने जैसे उपाय ही क्यों न करने पड़े। इन्हीं नीतियों के खिलाफ पिछले 25 वर्र्षो से किसान विरोध जता रहे हैं। सेन कमेटी के चार में से तीन सदस्य स्वतंत्र नोट्स सौंप रहे हैं, जो असहमति नोट्स की प्रकृति के न होते हुए हाजिर बाजार की बाधाओं को हटाकर सहज-सुगम्य बनाने और वायदा बाजार को फिर से चालू करने(लेकिन, चौकस नियामक के सख्त नियंत्रण में) के पक्ष में हैं।
-लेखक राज्यसभा सदस्य और शेटकारी संगठन से जुड़े हुए हैं।