संपादकीय. भारतीय हॉकी फेडरेशन पर डेढ़ दशक तक एकछत्र राज करने वाले केपीएस गिल को अंतत: उनके पद से बेदखल करना ही पड़ा। उन्हें पद से हटाना इतना आसान नहीं था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन की पहल पर भारतीय ओलिंपिक संघ ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया। यह सुखद आश्चर्य है कि हॉकी की कमान पूर्व ओलिंपियनों को सौंपी गई है। इससे उम्मीद बंधी है कि भारतीय हॉकी का अब भला होगा।
जहां तक गिल का सवाल है तो यह आश्चर्य है कि पंजाब से आतंकवाद को जड़-मूल से खत्म करने वाले गिल एक फेडरेशन को नहीं चला सके। आतंकवाद खत्म करने के लिए उनमें जो इच्छाशक्ति थी, वह हॉकी की भलाई के लिए नदारद थी। बार-बार प्रशिक्षकों को बदलना, प्रतिभावान खिलाड़ियों की चयन में उपेक्षा, पूर्व ओलिंपियनों को नजरअंदाज करना तथा चाटुकारों से घिरे रहने के कारण गिल हमेशा आलोचनाओं के घेरे में रहे।
वैसे गिल ने सहारा इंडिया परिवार को हॉकी से जोड़कर और प्रीमियर हॉकी लीग प्रारंभ कर हॉकी जगत का विश्वास जीतने की कोशिश की थी, लेकिन इसमें भी उनकी तानाशाही के कारण फेडरेशन के पदाधिकारी एकजुट नहीं हो सके। महासचिव ज्योतिकुमारन के साथ संवादहीनता के कारण फेडरेशन के पदाधिकारी दो गुटों में बंट गए। ज्योतिकुमारन ने भी हॉकी के भले की जगह निजी लाभ पर ज्यादा ध्यान दिया।
गिल में गवरेक्ति की आदत इतनी ज्यादा है कि हाल ही में जब भारतीय हॉकी टीम ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी, तो उन्होंने कहा था कि भारतीय टीम हारी है, मैं नहीं। हॉकी फेडरेशन के महासचिव ज्योतिकुमारन के घूस कांड ने जब तूल पकड़ा, तब भी उन्होंने गवरेक्ति के साथ कहा था कि ज्योतिकुमारन को भले हटना पड़े, लेकिन मुझे पद से कोई नहीं हटा सकता है। अपने पद से हटने के बाद खेलमंत्री के प्रति उनकी टिप्पणी भी खेदजनक है। गिल हटाए जा चुके हैं तथा थोड़े दिनों तक बयानबाजी करने के बाद वे या तो चुप हो जाएंगे या हो सकता है कि वे कोई और गुल खिलाएं।
गिल के जाने के बाद फेडरेशन की तदर्थ समिति की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। समिति के पांचों सदस्यों असलम शेर खान, अजीत पाल सिंह, धनराज पिल्लै, अशोक कुमार और जफर इकबाल का खिलाड़ी के रूप में काफी योगदान है। अब देखना है कि नई भूमिका में ये हॉकी के हित में क्या कुछ कर पाते हैं ताकि वल्र्ड कप 2011 की मेजबानी भारत से वापस नहीं ली जाए और भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दिन लौट आएं।