इंदौर. पिछड़ा वर्ग की छात्रवृत्ति को लेकर घोटाला जारी है। यही कारण है कि जिले में लगातार तीसरे वर्ष छात्रवृत्ति की राशि कम पड़ गई। सत्र 2007-08 के लिए पांच करोड़ रुपए कम पड़ गए। राज्य सरकार ने इस सत्र में करीब साढ़े सात करोड़ रुपए छात्रवृत्ति के आवंटित किए थे किंतु आवश्यकता 15 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। अब जिला प्रशासन ने बची हुई राशि के लिए सरकार से मांग की है। छात्रवृत्ति मामले में घोटाले होने की बात राज्य सरकार को पता है किंतु वह आंखें मूंदकर बैठी है। ऐसे में सिर्फ जिले में ही आधी (करीब साढ़े सात करोड़ रुपए) राशि गलत बंट जाती है।
सत्र 2007-08 में 14986 छात्रों को छात्रवृत्ति मिलना है। इनमें से कई छात्र इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज के भी हैं जो जेब से लगभग 40 हजार रु. तक फीस भरते हैं। ओबीसी वर्ग की आय सीमा 75 हजार रु. वार्षिक है लेकिन देखने में आ रहा है लगभग 50 प्रतिशत इस नियम का उल्लंघन कर रहे हैं। उपसंचालक पिछड़ा वर्ग विभाग नितिराज सिंह का कहना है यदि हम बारीकी से अध्ययन करेंगे तो हर संस्था में कई मामले मिलेंगे। ऐसे में संभव है आधे तहसीलदारों पर कार्रवाई की जाएगी क्योंकि आय प्रमाण पत्र जारी करना उन्हीं का काम है। दो वर्ष पूर्व 34 जिलों में प्रमाण पत्रों की जांच कराई गई किंतु छोटे-मोटे मामले ही मिले।
सरकारी कर्मचारी भी ले रहे हैं लाभ : नियम के अनुसार पटवारी आवेदक के घर जाए और दो पड़ोसियों से उसके काम के बारे में पूछे। फिर वस्तुस्थिति देखकर रिपोर्ट तहसीलदार को दे। तहसीलदार भी मौका निरीक्षण कर प्रमाण पत्र जारी करे मगर नियम का पालन नहीं होता। कुछ मामलों में तो सरकारी कर्मचारी के परिवार के लोग भी इसका लाभ लेते मिल जाएंगे जो पिता का नाम ही बदल लेते हैं।
जिले में चल रहा है रैकेट : कुछ लोग छात्रवृत्ति दिलाने के नाम पर रैकेट भी चला रहे हैं और छात्रों के पालकों से आवेदन भराने से लेकर छात्रवृत्ति दिलाने तक का काम कर रहे हैं। वे अपना कमीशन 30 से 35 प्रतिशत तक ले रहे हैं। आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक सुधांशु वर्मा का कहना है हम प्रमाण पत्र देखने के बाद ही छात्रवृत्ति जारी करते हैं।