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कारपोरेट सेक्टर पर लगाम कसें

मुद्रास्फीति के गंभीर सामाजिक निहितार्थ हैं। यह ऐसी प्रणाली है जिसके चलते आय के वितरण में विषमता आती है। जब कीमतें बढ़ती हैं तो निश्चित आय समूह वाले लोगों की आय घटती जाती है। जबकि दूसरे कई समूहों मसलन व्यापारी, व्यवसायी, रीयल एस्टेट डीलर्स और बिल्डर्स इत्यादि की आय में इजाफा होता है।

इस प्रकार, महंगाई से गरीब आहत होते हैं और अमीरों को फायदा पहुंचता है। अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिहाज से भी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना जरूरी है। इसी वजह से हाल ही में मुद्रास्फीति में आया तेज उछाल भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

सरकार महंगाई रूपी इस गंभीर मसले को आपूर्ति नियंत्रण के जरिए सुलझाने का प्रयास कर रही है। खाद्य तेलों, गैर-बासमती चावल और डेयरी उत्पादों पर सीमा शुल्क में कटौती की गई है। खाद्यान्न और दालों का निर्यात रोक दिया गया है। कारपोरेट सेक्टर को उत्पादों की कीमतें नियंत्रित रखने की हिदायत दी जा रही है। इसी तरह पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आए उछाल के अनुसार नहीं बढ़ाई गई हैं।

यह तो सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रास्फीति का बोझ उठा रही हैं। इसी के चलते रिलायंस कंपनी ने हरियाणा और पंजाब में पेट्रोल और डीजल की बिक्री को निलंबित रखने का फैसला किया। इसके अलावा सरकार बढ़ती कीमतों को थामने के लिए मांग प्रबंधन का सहारा ले सकती है और राजकोषीय व मुद्रा नीति भी अपना सकती है।

किसी कारणवश अगर ये उपाय असफल हो जाते हैं, तो सरकार इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट (१९५१) की धारा १८जी के तहत सीधे इसे अपने नियंत्रण में ले सकती है और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित कर सकती है। यह अलग बात है कि इसके लिए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की मौजूदा नीति व्यवस्था को सिरे से उलटना होगा।

कीमतों पर नियंत्रण के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मौजूदा मुद्रास्फीति का गहराई से विश्लेषण करते हुए इसके कारणों की पहचान करना बेहद जरूरी है। परिस्थितियों का बारीकी से परीक्षण करने पर पता चलता है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय कारणों की वजह से अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीतिक दबाव पड़ा है। इसका जीवाश्म ईंधन मसलन पेट्रोल और डीजल की तेजी से बढ़ती कीमतों से भी सीधा संबंध है।

लेकिन इसका बोझ पब्लिक सेक्टर की तेल कंपनियों के कंधों पर डालने की व्यवस्था को देखते हुए यह कारक मुद्रास्फीति का प्रमुख कारक नहीं हो सकता, जैसा कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा भी है। मुद्रास्फीति पर यह भारी दबाव भारत के कारपोरेट सेक्टर से आया है, जिसने इन परिस्थितियों का इस्तेमाल कर असामान्य ढंग से कीमतें बढ़ा दी हैं जबकि इनपुट की कीमतों में इस तरह का उछाल नहीं आया। यह तीव्र उछाल लौह-अयस्क (४६ फीसदी) और स्टील से आया है। सीमेंट भी एक ऐसा ही क्षेत्र है, जिसकी कीमतों में असामान्य ढंग से उछाल आया है। इस पर ध्यान देना होगा कि अभाव की हालत में कारपोरेट और गैर-कारपोरेट व्यवसाय से जुड़े दोनों ही क्षेत्रों के खिलाड़ी कीमतें बढ़ाने के लिए परस्पर गठबंधन कर हाथ मिला लेते हैं।

ज्ञातव्य है कि खाद्यान्नों की कीमतों में उछाल तभी से आना शुरू हुआ, जब सरकार ने पिछले साल निजी सेक्टर को खरीद व्यवस्था में सीधे आने की इजाजत दी। जब विश्वव्यापी स्तर पर कमी की बात सामने आई, तो व्यापारियों ने कीमतें बढ़ा दीं और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच की रोधी प्रणाली को ध्वस्त कर दिया।

जैसा कि पेट्रोल कीमतों के संदर्भ में रिलायंस का अनुभव रहा है कि जब कीमतें बढ़ाने पर कोई रोक नहीं थी, तो उसने असामान्य ढंग से लाभ कमाया और जब कीमतों पर लगाम कसी गई, तो उसने अपने हाथ खींच लिए। इस तरह उसने लाभ तो खुद कमाया और घाटे को सरकार के खाते में स्थानांतरित कर दिया। इस प्रक्रिया को ठीक से समझने की जरूरत है।

संकट के समय ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की कारपोरेट सेक्टर की लोलुपता पर जब तक अंकुश नहीं लगाया जाता, तब तक महंगाई पर नियंत्रण स्थापित करने के सारे प्रयास साधारण आदमी के लिए ही मुश्किलें खड़ी करते रहेंगे। यानी कारपोरेट सेक्टर द्वारा मुश्किलों से जूझ रही जनता के शोषण की प्रवृत्ति पर जब तक रोक नहीं लगाई जाती, आम जनता के लिए सामान्य उपाय ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।

अब हमें कारपोरेट सेक्टर को दी गई असाधारण आजादी का पुनरावलोकन करना होगा, जो आम आदमी की कीमत पर फल-फूल रहे हैं। विकास के लाभ आम आदमी से कारपोरेट सेक्टर तक स्थानांतरित होने की जांच करनी होगी, जिनका नीति-निर्धारकों पर खासा प्रभाव है।

-लेखक पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।





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