मैंने राजनीति में 1937 में प्रवेश किया। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी, लेकिन मैंने मैट्रिक की परीक्षा जल्दी पास कर ली थी इसलिए कॉलेज में भी मैंने जल्दी प्रवेश किया। उस समय पूना में आरएसएस और सावरकरवादी लोग एक तरफ, तो राष्ट्रवादी, विभिन्न समाजवादी और वामपंथी दल दूसरी तरफ थे। उसी समय से इनके साथ हमारा मतभेद था। हमारा संघ से पहला मतभेद था राष्ट्रीयता की धारणा पर। हम लोगों की मान्यता थी कि हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोगों के समान अधिकार हैं, लेकिन आरएसएस के लोगों और सावरकर ने हिंदू राष्ट्र की कल्पना सामने रखी। जिन्ना भी इसी किस्म की सोच के शिकार थे।
दूसरा महत्वपूर्ण मतभेद यह था कि हम लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना चाहते थे और आरएसएस के लोग कहते थे कि वह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। उन दिनों आरएसएस के लोग हिटलर की बहुत तारीफ करते थे। तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने अपनी किताब ‘वीआर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में एक जगह कहा है, ‘हिंदुस्तान के सभी गैर हिंदू लोगों को हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी।
हिंदू धर्म का आदर करना और हिंदू जाति और संस्कृति के गौरव गान के अलावा कोई और विचार अपने मन में नहीं लाना होगा। एक वाक्य में कहें तो वे विदेशी होकर रहना छोड़ें, नहीं तो उन्हें हिंदू राष्ट्र के अधीन होकर ही यहां रहने की अनुमति मिलेगी।’
हमारा अगला मतभेद यह था कि आरएसएस वर्ण-व्यवस्था का समर्थक है और मेरे जैसे समाजवादी वर्ण-व्यवस्था के सबसे बड़े दुश्मन हैं। हमारे मतभेद का चौथा बिंदु है भाषा। हम लोकभाषा के पक्ष में हैं। सारी लोकभाषाएं भारतीय हैं। लेकिन गुरुजी ने अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में कहा है, ‘संपर्क भाषा की समस्या के समाधान के रूप में जब तक संस्कृत स्थापित नहीं हो जाती, तब तक सुविधा के लिए हमें हिंदी को प्राथमिकता देनी होगी।’ लेकिन हम किसी के ऊपर भी हिंदी लादना नहीं चाहते। अगर गैर हिंदी भाषी राज्य अंग्रेजी का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो करें। लेकिन संस्कृत एक विशिष्ट वर्ग की भाषा है। इसको राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देने का मतलब है देश में मुट्ठीभर लोगों का वर्चस्व। जो हम नहीं चाहते।
पांचवीं बात, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में संघ राज्य की कल्पना को स्वीकार किया गया था। संघ राज्य में केंद्र के जिम्मे निश्चित विषय होंगे, उनके अलावा जो विषय होंगे, वह राज्यों के अंतर्गत होंगे। मुल्क के विभाजन के बाद राष्ट्रीय नेता चाहते थे कि केंद्र को मजबूत बनाया जाए, इसलिए संविधान में एक समवर्ती सूची बनाई गई। लेकिन गुरुजी ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में कहते हैं, संविधान का पुनरीक्षण होना चाहिए और इसका पुनर्लेखन कर शासन की एकात्मक प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।
इसके अलावा स्वतंत्रता आंदोलन का राष्ट्रीय झंडा था तिरंगा। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज नहीं मानता। वह तो भगवा ध्वज को ही मानता था और कहता था, भगवा ध्वज हिंदू राष्ट्र का प्राचीन झंडा है। जब कांग्रेस के एकतंत्रीय शासन के खिलाफ हमारी लड़ाई चल रही थी, तो हमारे नेता डॉ. राममनोहर लोहिया कहते थे कि कांग्रेस को हटाने और देश को बचाने के लिए हमको विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों के साथ तालमेल बैठाना चाहिए। आखिर तक मैं यह कहता रहा कि आरएसएस और जनसंघ के साथ हमारा तालमेल नहीं बैठेगा। अंत में डॉक्टर साहब ने कहा कि बड़े दुश्मन को हराने के लिए इस मामले में तुम मान जाओ।
जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लादी या वह तानाशाही की ओर बढ़ने लगी, तो यह बात सही है कि इमरजेंसी के खिलाफ लड़ने के लिए लोगों ने इनके साथ तालमेल बिठाया। लोकनायक जयप्रकाश जी कहते थे कि एक पार्टी बनाए बिना हम लोग इंदिरा को और तानाशाही को नहीं हटा सकते। मेरी राय थी कि चुनाव लड़ना चाहिए। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि यह जो समझौता हुआ था, वह दलों के बीच में हुआ था- जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस, भालोद और कुछ विद्रोही कांग्रेसी। आरएसएस के साथ न हमारा कोई करार हुआ, न आरएसएस की कोई शर्त मानी गई।
बाद में जब हम लोग पार्टी का नया संविधान बना रहे थे तो हमारी संविधान उपसमिति ने एक सिफारिश की थी कि ऐसे किसी संगठन के सदस्यों को जिसके उद्देश्य, नीतियां और कार्यक्रम जनता पार्टी के उद्देश्य नीतियों और कार्यक्रम से मेल नहीं खाते, पार्टी का सदस्य नहीं बनने देना चाहिए। अकेले सुंदरसिंह भंडारी ने इसका विरोध किया।
जनता पार्टी का जो चुनाव घोषणा पत्र बना, उस पर आरएसएस की विचारधारा का जरा भी असर नहीं था, बल्कि एक-एक मुद्दे को सफाई के साथ स्पष्ट किया गया था। यह बात सही है कि आरएसएस के लोगों ने दिल से इस चुनाव घोषणापत्र को नहीं स्वीकारा। मैं शुरू से बिलकुल स्पष्ट था कि अगर जनता पार्टी को एक सुसंबद्ध पार्टी के रूप में काम करना है तो दो काम अवश्य करने पड़ेंगे।
नंबर एक आरएसएस वालों को अपनी विचारधारा बदलनी पड़ेगी। नंबर दो, आरएसएस के परिवार के जो संगठन हैं जैसे भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद इन संगठनों को अपना अलग अस्तित्व समाप्त करना पड़ेगा और जनता पार्टी के समानधर्मी संगठनों के साथ अपने को विलीन करना पड़ेगा। उन लोगों ने कहा कि यह इतना जल्दी कैसे होगा।
बड़ी दिक्कतें हैं, लेकिन हम धीरे धीरे बदलना चाहते हैं। वे इस तरह की गोलमोल बातें करते रहते थे। उनके आचरण को देखकर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उसको बदलना है नहीं। खासकर 1977 के जून के विधानसभा चुनावों के बाद जब उनके हाथ में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश का शासन आ गया तो इसके बाद वे सोचने लगे कि अब हमको बदलने की क्या जरूरत है। एक अर्से तक इन लोगों से मेरी बातचीत होती रही।
लेकिन मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उनके दिमाग के जो किवाड़ हैं, वह बंद हैं और उसमें कोई नया विचार पनप नहीं सकता। सिर्फ अटल जी कहते हैं कि राष्ट्रीयता, लोकतंत्र, समाजवाद, सामाजिक न्याय आदि धारणाओं को स्वीकारना चाहिए। उसके बिना अब नहीं चला जा सकता पर बाकी संघ के लोग ऐसा नहीं कहते।
-1 मई को मधु लिमये(1922-1995) का जन्मदिन भी है।